पाकिस्तान में फिर चली कट्टरपंथ की : डॉ. प्रभात ओझा

ईश निंदा के कथित मामले में करीब नौ साल बाद सुप्रीम कोर्ट से आसिया बीबी की रिहाई पाकिस्तान में कानूनी शासन के प्रमाण देने लगी थी. प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी इस मामले में अपना शुरुआती रुख ऐसा रखा, जिससे उम्मीद बंध रही थी. कट्टरपंथियों के आंदोलन को दरकिनार करते हुए उन्होंने आसिया की रिहाई को कानून सम्मत बताया था. नये प्रधानमंत्री ने लोगों को कानून के पालन की हिदायत भी दी थी. अब उन्हीं इमरान खान के कट्टरपंथियों के आगे झुक जाने की खबरें आ रही हैं. सुप्रीम कोर्ट से रिहाई के आदेश के बाद भी आसिया को हिरासत में ही रखने पर सहमति बनी है. इस सहमति का कारण धार्मिक और राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-लबैक के दबाव को माना जा रहा है. तहरीक-ए-लबैक के नेता और कट्टरपंथी समुदाय का नेतृत्व करने वाले पीर अफजल कादरी ने सरकार और सेना तक को चुनौती दी है कि सहमति को तोड़ने की जुर्रत की गई तो देश में गृह युद्ध शुरू हो जायेगा.
पाकिस्तान में हंगामे के ताजा मामलों की पृष्ठभूमि को समझ लेना जरूरी है. पंजाब प्रांत के एक गांव की रहने वाली आसिया नूरीन उर्फ आसिया बीबी 2009 की एक गर्मी भरी दोपहर में फालसे बीन रही थी. बेहद प्यासी आसिया ने झाड़ियों से निकलकर कुएं पर रखी बाल्टी- गिलास से पानी क्या पिया, दूसरी औरतों ने हंगामा खड़ा कर दिया. आसिया नूरीन ईसाई समुदाय की है. उस पर आरोप लगे कि बहस के दौरान उसने मोहम्मद साहब का अपमान किया है. मामला मौलवी तक और फिर कोर्ट तक जा पहुंचा. इस बीच उसे गिरफ्तार किया जा चुका था. निचली और हाई कोर्ट ने उसे ईश निंदा के आरोप में फांसी की सजा सुना दी. अभी 31 अक्टूबर को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आसिया ने पैगम्बर मोहम्मद साहेब की निंदा नहीं की. फिर कोर्ट की यह तीखी टिप्पणी भी गौर करने लायक थी- ‘यह भीड़, व्यक्ति या कोई गुट तय नहीं करेगा कि कौन-सा मामला ईशनिंदा के कानून का है. यह फैसला सबूतों और गवाहों को सुनने के बाद देश की अदालत करेगी.’
अब सवाल है कि पाकिस्तान में कानून का पालन हो रहा है, तो फिर सरकार और सेना के अदालत के फैसले के साथ होने के बावजूद कट्टरपंथी हावी कैसे हो गये हैं. कट्टरपंथियों ने पूरे पंजाब और उसके बाहर भी हिसात्मक आंदोलन किया. वे सुप्रीम कोर्ट पर अपना फैसला बदलने का दबाव बना रहे थे. सरकार से समझौते के तहत यह तय हुआ है कि आसिया देश से बाहर नहीं जा पायेगी. उसे हिरासत में रखा जायेगा. यही नहीं, इस बीच सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की जायेगी तो सरकार उसका विरोध नहीं करेगी. साफ है कि इस तरह का समझौता पाकिस्तान में कानून का नहीं, कट्टरपंथ के चलने का संकेत है. ऐसे में जिस तरह हाई कोर्ट तक कट्टरपंथी दबाव ने काम किया, दोबारा सुनवाई होने पर शायद सुप्रीम कोर्ट भी इस दबाव से बच न पाये.
असल में 1987 में पाकिस्तान के तानाशाह शासक जिया उल हक ने ईस निंदा कानून में काफी बड़े बदलाव किए थे. इसके तहत कोई इस्लामी व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है. कुरान को अपवित्र करने वाले को उम्रकैद और पैगम्बर मोहम्मद साहेब के खिलाफ बोलने भर से उम्र कैद अथवा मौत तक हो सकती है. कानून में यह परिवर्तन उनके अनुकूल था, जो व्यक्तिगत झगड़ों को भी धार्मिक बनाकर अपना उल्लू साधा करते हैं. इन लोगों ने इसका ऐसा प्रचार-प्रसार किया कि यह देश का कम अल्लाह का कानून ज्यादा बन गया. कम पढ़े लिखे आम लोगों में यह धार्मिक न्याय का हिस्सा बनता गया.
पाकिस्तान के ईश निंदा कानून का कट्टरपंथियों ने खूब फायदा उठाया. इस कानून में बड़ा बदलाव 1987 में किया गया था. ‘नेशनल कमीशन फॉर जस्टिस एंड पीस’ द्वारा प्रकाशित एक शोध के मुताबिक इस कानून में बदलाव किये जाने से पहले के 50 साल में ईशनिंदा के केवल सात मामले ही दर्ज हुए थे. अब बदलाव के बाद 31 साल में एक हजार, 500 से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं. माना कि ऐसे मामलों में करीब 700 मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ भी हैं. फिर भी एक बात पर गौर किया जाना चाहिए. पाकिस्तान में अल्पसंख्यक यानी गैर मुस्लिमों की संख्या केवल तीन फीसद है. इन्हीं में हिन्दू और ईसाई भी हैं. स्वाभाविक है कि करीब एक हजार,500 मुकदमों मे आबादी के हिसाब से अल्पसंख्यक ही इसके अधिक शिकार हैं. अब आसिया बीबी मामले में अदालत के फैसले के बाद पाकिस्तान में तौहीन-ए-रिसालत (ईशनिंदा) कानून पर फिर से बहस चल पड़ी है. सच यह है कि ईश निंदा मामलों में पाकिस्तान की कोर्ट कुछ फैसला दे, भीड़ अपना काम कर डालती है. यह तो आसिया बीबी की किस्मत है, जो बची रही. भीड़ ने वैसे भी उसे पीटकर मरा हुआ समझ छोड़ दिया था. पाकिस्तान के ही रिकॉर्ड बताते हैं कि 1990 के बाद से करीब 17 साल में ईशनिंदा के आरोपित कम से कम 69 लोगों को भीड़ ने ही मार डाला. मानवाधिकार संगठनों और अन्य स्रोत बताते हैं कि पाकिस्तान में वर्तमान समय 40 लोग ईशनिंदा कानून के तहत जेलों में हैं. ये सभी दोष- सिद्ध होकर मौत का इंतजार कर रहे हैं या उम्रकैद काट रहे हैं. वहां की निचली अदालतों में इस तरह के मामले तो सैकड़ों की संख्या में आये. वहां सजा सुनाई गई लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव, छानबीन में कमी अथवा शिकायतकर्ता की गलत मंशा के तर्क पर आरोपितों को बरी कर दिया.

एक असलियत और भी है कि ईश निंदा के मामले में इस तरह के कानून मुस्लिम देशों में ही अधिक हैं. प्यू रिसर्च नामक संस्था ने 2015 में एक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 26 फीसद देशों में धर्म अथवा उसके प्रतीकों के अपमान पर सजा के कानून हैं. जो देश इस तरह के कानून रखते हैं, उनमें से 70 प्रतिशत मुस्लिम बहुमत बाले हैं. अधिकतर देशों इस अपराध में जुर्माना और कैद की सजा का प्रावधान है. इनके विपरीत सऊदी अरब, ईरान और पाकिस्तान में ईश निंदी की सजा मौत तक मुकर्रर की गई है. पाकिस्तान में यह कानून कहां से आया, इस पर गौर करने लायक है. ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1860 में मुस्लिम आबादी की मांग पर इस कानून को संहिताबद्ध किया गया. वर्ष 1927 में इस कानून का विस्तार हुआ था. आजादी और भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसे जारी रखा. साल 1980 आते-आते पाकिस्तान में जिया-उल हक की सैन्य सरकार ने 1986 तक इस कानून में और अधिक धाराएं शामिल कर लीं. अगले साल 1987 तक तक तो यह इस्लामी कानून का खास हिस्सा बन चुका था.

पाकिस्तान में इस कानून के तहत देश के इस्लामीकरण की भावना ही काम कर रही थी. इसके तहत 1973 तक अहमदी समुदाय को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया. ब्रिटिश सरकार के दौरान जो कानून बना था, उसके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी पूजा की वस्तु या जगह को नुकसान पहुंचाए अथवा धार्मिक सभा में बाधा डाले तो उसे दंड का प्रावधान था. साथ ही बोलकर या लिखकर या कुछ दृश्यों से कोई किसी की धार्मिक भावनाओं का अपमान करता है तो वह भी गैरकानूनी बनाया गया था. तब इन अपराधों में 10 साल तक की सजा तय थी. आजादी के काफी बाद पाकिस्तान में 1980 की शुरुआत में वहां की दंड संहिता में धार्मिक मामलों से संबंधित अपराधों में कई अन्य धाराएं जोड़ दी गईं. इन्ही में अहमदी विरोधी कानून और ईशनिंदा कानून भी शामिल हुआ. अहमदी विरोधी कानून के तहत अहमदियों को खुद को मुस्लिम या उन जैसा बर्ताव करने पर प्रतिबंध लगाया गया. ईश निंदा कानून कई चरणों में पूरा हुआ. अब मसला इस कानून के पक्षपाती भर होने का नहीं है. इससे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान की नई सरकार ने देश की सर्वोच्च न्यायालय की श्रेष्ठता मामने का जो संकेत दिया था, वह बहुत जल्द कट्टरपंथी ताकतों के आगे ढीला होता दिख रहा है. निश्चित ही यह पाकिस्तान के संस्थापक समझे जाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना की उस भावना के भी अनुरूप नहीं है, जिसमें वह करते थे कि आप किसी भी धर्म से क्यों न हों- देश को आपके धर्म से कोई फर्क नहीं पड़ता.

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