सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा, कहा-राफेल सौदा नियमों के मुताबिक

नई दिल्ली, 12 नवम्बर (उदयपुर किरण). राफेल डील मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि डील में दसाल्ट द्वारा रिलायंस को साझेदार बनाने में उसभूमिका नहीं है.

सरकार ने कहा कि वह निर्णय पूरी तरह से व्यायसायिक था. इस मामले पर केंद्र सरकार ने राफेल की खरीद के फैसले लेने की प्रकिया से जुड़े सारे दस्तावेज याचिकाकर्ता को सौंप दिये. केंद्र ने कहा है कि राफेल की खरीद में पूरी प्रकिया का पालन किया गया. करीब एक साल फ्रांस से बात चली. सुरक्षा पर मंत्रिमंडल की समिति से अनुमति लेने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.
केंद्र सरकार ने कहा कि इस डील पर साल 2013 यानी यूपीए सरकार के शासनकाल में ही फैसला हो गया था. भारतीय पक्षकारों की ओर से 36 राफेल जेट विमानों को लेकर 4 अगस्त, 2016 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस पर विधि और वित्त मंत्रालय ने अपने
20 दिनों में 24 अगस्त, 2016 को हरी झंडी दिखा दी. उसके बाद दोनों देशों ने 23 सितम्बर, 2016 को हस्ताक्षर किए.
केंद्र सरकार ने सीलबंद लिफाफे में अपना हलफनामा दायर किया है. केंद्र सरकार ने कहा है कि राफेल निर्माता दसॉल्ट या उसके हथियार विक्रेता ने अभी तक निर्धारित ऑफसेट में औपचारिक प्रस्ताव नहीं दिया है जो ऑफसेट डिस्चार्ज के लिए भारतीय ऑफसेट भागीदारों और उत्पादों के विवरण के बारे में बताता हो. इसका मतलब है कि दसॉल्ट ने अभी तक औपचारिक रूप से रिलायंस डिफेंस की भूमिका को भारतीय ऑफसेट पार्टनर के रूप में नहीं बताया है. केंद्र ने कहा कि अक्टूबर 2019 तक कोई ऑफसेट पार्टनर भारत से समझौते के तहत कोई पैसा नहीं ले सकता है.
पिछले 31 अक्टूबर को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा था कि 10 दिन में राफेल फाइटर एयरक्राफ्ट की कीमत और अन्य स्ट्रेटजिक डिटेल सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को दे. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वो स्ट्रेटजिक और गोपनीय डिटेल के निर्णय प्रक्रिया की प्रति याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराएं. कोर्ट ने डील में भारतीय कंपनी को शामिल करने की भी जानकारी मांगी.
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि राफेल जेट से जुड़ी अधिकतर सूचनाएं यहां तक कि उसकी कीमत ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत आती हैं, इसलिए यह संभव नहीं है कि ये किसी से साझा किया जाए. तब कोर्ट ने कहा था कि अगर सरकार ये सोचती है कि राफेल की कीमत साझा नहीं की जा सकती है तो इसे सीलबंद लिफाफे में दाखिल करें. आप कोर्ट में अर्जी दायर करो कि आप क्यों दस्तावेज नहीं दे सकते हैं.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने कहा था कि इस मामले की कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच होनी चाहिए तब कोर्ट ने कहा था कि हम इंतजार कर सकते हैं. जब प्रशांत भूषण ने इस पर जोर दिया तो चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि पहले सीबीआई अपने घर को दुरुस्त कर ले.
कोर्ट ने कहा था कि किसी भी याचिकाकर्ता ने राफेल जेट की भारतीय वायु सेना की उपयोगिता पर सवाल खड़ा नहीं किया है. याचिकाकर्ताओं ने केवल निर्णय प्रक्रिया और उसकी कीमत पर सवाल किया है. कोर्ट ने कहा था कि केंद्र को बिना स्ट्रेटेजिक डिटेल दिए निर्णय प्रक्रिया की डिटेल आम जनता के बीच लानी चाहिए.
वकील एमएल शर्मा ने कहा था कि मामले की सुनवाई पांच राज्यों मे होने वाले आगामी चुनाव के बाद हों, क्योंकि अटार्नी का कहना है कि चुनाव के कारण राजनैतिक उद्देश्य से याचिका दायर की गई है. इस पर कोर्ट ने कहा था कि मुझे नहीं मालूम आप किस चुनाव की बात कर रहे हैं. कोर्ट को चुनाव से क्या लेना?
केंद्र सरकार ने राफेल डील मामले में निर्णय प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट को पहले ही सौंप दी है. केंद्र सरकार ने तीन सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को निर्णय प्रक्रिया की जानकारी सौंपी है. पिछले 10 अक्टूबर को राफेल डील के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वो उन कदमों की विस्तृत जानकारी दें, जिनकी वजह से ये डील की गई है. कोर्ट ने कहा था कि हम केवल राफेल डील की निर्णय प्रक्रिया के बारे में पूछ रहे हैं. आप सीलबंद लिफाफे में हमें जानकारी दें. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया था.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और वकील मनोहर लाल शर्मा ने कोर्ट से कहा था कि ऊंची दर पर खरीदने की वजह से देश को नुकसान झेलना पड़ा है. केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि सभी याचिकाएं राजनीति से प्रेरित हैं. सुप्रीम कोर्ट को इन याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा था कि लोग उन सवालों को पूछ रहे हैं, जिनका संसद में जवाब दिया जा चुका है. ये जनहित याचिका न होकर पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन है. ये याचिका चुनाव के पहले दायर की गई है, जब सरकार और विपक्ष के बीच इसे लेकर तीखी बहस हो रही है. तब चीफ जस्टिस ने कहा था कि अगर हम कहें कि आप इस डील से संबंधित डिटेल दें, तब अटार्नी जनरल ने कहा था कि ये राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है. इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है. तब कोर्ट ने कहा था कि आप हमें बताएं कि राफेल डील कैसे की गई.

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