अमेरिका, ब्राजील, आस्ट्रेलिया की धमकी, भारत चीनी निर्यात पर बंद करे सब्सिडी

नई दिल्ली,14 सितम्बर (उदयपुर किरण). अमेरिका सहित विश्व के तमाम धनी देश अपने यहां किसानों को फल, दूध, फसलों, मसालों के उत्पादन से लगायत निर्यात पर तरह-तरह की सब्सिडी या आर्थिक सहायता या छूट देते हैं. इसी तरह से स्टील, दवाओं, उपकरणों, खनिज पदार्थों आदि के भी निर्यात प्रोत्साहन के लिए हर देश अपने अनुसार अपने यहां के उद्यमियों को मदद देते हैं. लेकिन यही कार्य जब कोई गरीब या विकसित देश करते हैं तो वे उस पर “जबरा मारे, रोवन न दे” की तर्ज पर कार्रवाई करने की धौंस देते हैं. चीनी निर्यात मुद्दे पर अमेरिका, ब्राजील और आस्ट्रेलिया ने भारत के विरूद्ध कुछ इसी तरह की धौंस दी है. उन्होंने कहा है कि भारत चीनी निर्यात पर सब्सिडी देना बंद करे वरना उसके विरूद्ध विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ)में शिकायत करेंगे.

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि राबर्ट लाइट्जर ने चेतावनी दी है कि भारत अपने यहां गेहूं, धान, गन्ना खरीद में मार्केट सपोर्ट दे रहा है, उसको विश्व व्यापार संगठन के सामने लाया जा सकता है. आस्ट्रेलिया के वाणिज्य मंत्री साइमन वर्मिंघम ने भी भारत पर विश्व बाजार में चीनी का दाम कम करने का आरोप लगाया है. ब्राजील के गन्ना उत्पाद समूह यूनिका के कार्यकारी निदेशक एडूअर्डो लियो ने कहा है कि चीनी निर्यात पर सब्सिडी देने के मामले में भारत को ब्राजील विश्व व्यापार संगठन में घसीट सकता है. इधर कृषि राज्यमंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत का कहना है कि भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन की शर्तों का पालन किसी भी अन्य देश से ज्यादा कर रही है. सभी देश अपने किसानों, व्यापारियों, उद्यमियों की चिंता करते हैं, भारत भी कर रहा है.

भारत में हालत यह है कि इस वर्ष यानि 2017-18 में चीनी का उत्पादन 2016-17 से 10 मिलियन टन अधिक हुआ है. बीते वर्ष 20.3 मिलियन टन हुआ था, इस वर्ष (गन्ने का सीजन 30 सितम्बर 2018को खत्म होगा) 30.3 मिलियन टन हुआ है. इतनी चीनी की खपत भारत में होगी नहीं, इसलिए निर्यात किया जाएगा. यदि निर्यात नहीं होगा, तो चीनी मिलों को घाटा लगेगा. यदि सब्सिडी देकर कम दाम पर निर्यात किया जाएगा तो अन्य चीनी उत्पादक देश विश्व बाजार में कुव्यवस्था फैलाने और सबके लिए समान बाजार उपलब्धता के नियम का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर कार्रवाई करने की मांग करेंगे, क्योंकि भारत से सस्ते दर पर चीनी उन देशों के व्यापारी मंगाने लगेंगे और उस देश के चीनी मिलों द्वारा उत्पादित महंगे दर पर मिलने वाली चीनी नहीं खरीदेंगे.

इसी से चिंतित उक्त देशों ने भारत को धमकी दी है. हालांकि भारत सरकार अपने यहां के चीनी मिल मालिकों या निर्यातकों को चीनी निर्यात पर सीधे कोई सब्सिडी नहीं देती है. लेकिन सरकार ने चीनी मिलों को गन्ना किसानों से गन्ना खरीद पर प्रति टन 55 रुपये देने की घोषणा की है. सरकार ने चीनी मिलों को चीनी निर्यात का कोटा भी बांध दिया है. यह कि देश की सभी चीनी मिलें कुल मिलाकर 02 मिलियन टन से अधिक चीनी निर्यात नहीं कर सकतीं. इससे अधिक निर्यात करने पर भारत में चीनी महंगी हो जाएगी. फिर अन्य देशों से महंगे दर पर आयात करनी पड़ेगी. लेकिन बायोफ्यूल को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार ने जून 2018 में चीनी मिलों के लिए पैकेज घोषणा की है उसमें एथनाल उत्पादन स्टाक तीन वर्ष में बढ़ाने के लिए 4,500 करोड़ रुपये का साफ्ट ऋण भी शामिल है. जिसका 5 वर्ष का ऋण लगभग 1,332 करोड़ रुपये सरकार वहन करेगी.

इस बारे में बीएचयू प्रबंध संस्थान के पूर्व निदेशक डा. छोटेलाल का कहना है कि विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के अनुसार वैसे भी 2023 तक किसी भी तरह की सब्सिडी को बंद किया जाना है. ऐसे में सभी उत्पादों पर आर्थिक छूट देने में धीरे- धीरे कटौती की जा रही है. जहां तक चीनी उत्पाद पर सब्सिडी देने की बात है तो इसमें कोई सीधे सब्सिडी नहीं दी जा रही है. सरकार द्वारा चीनी मिलों को किसानों से गन्ना खरीद पर प्रति टन 55 रुपये दिये जाने की घोषणा को परोक्ष रूप से दी जाने वाली सब्सिडी का आरोप लग सकता है. इसी तरह से एथनाल का स्टाक बनाने के लिए 4,500 करोड़ रुपये के साफ्ट ऋण को भी कुछ देश इसी का पार्ट कह सकते हैं. जबकि भारत सरकार चीनी मिलों को एथनाल का उत्पादन बढ़ाने के लिए, जिसका उपयोग हवाई जहाज,गाड़ियों, कारों, ट्रकों में बायोफ्यूल उपयोग बढ़ाने के लिए होगा, साफ्ट ऋण दे रही है. इससे विदेश से महंगे कच्चे तेल आयात से निजात मिलेगा और प्रदूषण भी कम होगा. भारत सरकार के प्रतिनिधियों का भी यही कहना है.

 

 

 

Report By Udaipur Kiran

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