कुष्ठ रोगियों से भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए दिशा-निर्देश

केंद्र और राज्य सरकारों से कहा कि कुष्ठ रोगियों को समाज और परिवार से अलग नहीं रखा जाए

नई दिल्ली, 14 सितंबर (उदयपुर किरण). कुष्ठ रोगियों से भेदभाव करने के मामले पर आज केंद्र और राज्य सरकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किया. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि कुष्ठ रोगियों को समाज और परिवार से अलग नहीं रखा जाए.

कोर्ट ने कुष्ठ रोगियों के इलाज के लिए पहले से चल रहे कुष्ठ रोग उन्मूलन अभियान को सामान्य स्वास्थ्य सेवा के साथ जोड़ने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कुष्ठ रोगियों के इलाज के लिए पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिए. कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को इसे लेकर सेमिनार और जागरुकता अभियान चलाने का निर्देश दिया.

कोर्ट ने कुष्ठ रोग को स्कूलों के सिलेबस में शामिल करने का निर्देश दिया. कुष्ठ रोगियों की पुनर्वास और देखभाल की व्यवस्था करने का भी निर्देश कोर्ट ने दिया. कोर्ट ने कहा कुष्ठ रोग से ग्रस्त महिलाओं को अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराने के लिए व्यवस्था की जाए. कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्य ये सुनिश्चित करें कि कुष्ठ रोग से ग्रस्त बच्चों के साथ स्कूल और अस्पताल में कोई भेदभाव नहीं हो.

इस मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि कुष्ठ रोगियों से भेदभाव करने वाले कानूनी प्रावधानों को खत्म करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक नए कानून को हरी झंडी दी है. इसे जल्द ही संसद के पटल पर रखा जाएगा. केंद्र की ओर से एएसजी पिंकी आनंद ने कहा कि इस प्रक्रिया को पूरा करने में चार महीने का समय लगेगा.

पिछले 5 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा-निर्देश में कहा था कि राज्य सरकारों की ये प्राथमिकता होनी चाहिए कि वे ये देखें कि कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति के साथ भेदभाव न हो. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऑल इंडिया रेडियो और दिल्ली दूरदर्शन केंद्र और राज्य स्तर पर प्राइम टाइम में प्रोग्राम प्रसारित कर बताएं कि कुष्ठ रोग का इलाज संभव है. लोगों में जागरुकता लाने के लिए सरकार स्पेशल विंग का गठन करे जिसमें प्रतिबद्ध अधिकारी हों. अपने दिशा-निर्देश में कोर्ट ने कहा है कि अस्पताल कुष्ठ रोग से पीड़ित किसी भी व्यक्ति का इलाज करने के लिए मना नहीं करेंगे.

याचिका विधि सेंटर फॉर पॉलिसी ने दायर किया था. 4 दिसंबर 2017 को याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट से कहा था कि देश के 119 कानून ऐसे हैं जो कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव बरतते हैं. इस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि लॉ कमीशन ने भी इस बारे में अपनी अनुशंसा की है. उन्होंने कहा था कि हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में जा रहे हैं और अभी भी कुष्ठ रोगी मेनस्ट्रीम से बाहर हैं.

याचिका में पर्सनल लॉ का जिक्र किया गया है जिसमें कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव किया गया है. लोक उपक्रमों में रोजगार और नियुक्तियों के मामले के अलावा कुष्ठ रोगियों को पब्लिक प्लेस पर घुमने से भी रोका जाता है.आधुनिक चिकित्सा के जमाने में भी हम कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव करते हैं. अब जबकि ये साबित हो गया है कि इस रोग का पूर्ण इलाज संभव है उसके बावजूद कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव किया जाता है. याचिकाकर्ता विधि सेंटर फॉर पॉलिसी ने लॉ कमीशन ऑफ इंडिया को 256वां रिपोर्ट बनाने के दौरान कुष्ठ रोगियों के मामले में मदद की थी.

Report By Udaipur Kiran

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