वन-डे डिफॉल्ट नॉर्म पर एक-दो दिन में हो सकता है फैसला: आरबीआई

मुंबई, 31 अगस्त (उदयपुर किरण). आरबीआई की ओर से बैंकों को तनावग्रस्त कर्जों (एनपीए) के पुनर्भुगतान और डिफॉल्टर कंपनियों से मामला सुलझाने के लिए 180 दिन का समय दिया गया था, जो 27 अगस्त को समाप्त हो गया है. आरबीआई ने मियाद खत्म होते ही वन-डे डिफॉल्ट नॉर्म की पॉलिसी सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए थे. लेकिन आरबीआई के इस निर्देशों का कितना पालन हो रहा है, इस संदर्भ में आरबीआई और बैंकों की ओर से फिलहाल कोई जवाब नहीं मिल सका है.

केंद्रीय बैंक के सूचना विभाग ने बताया कि इस संदर्भ में अगले दो दिनों में निर्णय लिया जा सकता है. इस बीच केंद्रीय बैंक ने 30 गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का पंजीकरण प्रमाण-पत्र रद्द कर दिया है. बता दें कि पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में बैंकों का कुल नुकसान 2.42 लाख करोड़ रुपये रहा था. पिछले साल बैंकों का कुल एनपीए स्टॉक 1.2 लाख करोड़ रुपये बढ़कर 10.4 लाख करोड़ हो गया था. इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि बड़े कर्जदार कंपनियों नो दिवालिया घोषित कर दिया है. 70 से ज्यादा कम्पनियों के कर्ज से जुड़े मामले नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) के पास विचाराधीन हैं.

सूत्रों के अनुसार, एनसीएलटी में बड़ी कंपनियों के साथ ही सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों के फंसे कर्जों की सुनवाई चल रही है. एनसीएलटी में एसबीआई के 40 मामले, आईडीबीआई के 40, आईसीआईसीआई के 32, पीएनबी के 35, एक्सिस बैंक के 23, बैंक ऑफ बड़ौदा के 20, यूनियन बैंक के 18 और बैंक ऑफ इंडिया के 8 बड़े मामले की. सुुुनवाई चल रही है. निजी क्षेत्र के बैंक एक्सिस बैंक के 23, आईडीबीआई के 40 और आईसीआईसीआई के 32 मामले यानी निजी बैकों में जहां डिफॉल्ट होने की गुंजाइश कम रहती है, वहां भी बैड लोन की भारी समस्या है. निजी बैंकों को भी एनपीए का भारी झटका लगना तय है. यह बैंक भी पीसीए फ्रेमवर्क के तहत आ सकते हैं. दीवालिया कार्रवाई आगे बढ़ने पर शेयर बाजार को अगले साल जोरदार झटका लग सकता है.

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से विश्व स्तर पर मान्य बेसल-3 मानकों को लागू करने की सख्ती बरती जा रही है और यह समय सीमा भी समाप्त हो चुकी है. देश के सभी बैंकों को बेसल-3 मानक 1 जनवरी 2013 से लेकर 31 मार्च 2018 तक धीरे-धीरे लागू करना था, लेकिन अब इस अवधि को 1 साल बढ़ाकर 31 मार्च 2019 कर दिया गया है. भारतीय बैंकों को बेसल-3 के नियमों को पूरा करने के लिए करीब 4.22 लाख करोड़ रुपये (65 अरब डॉलर) अतिरिक्त पूंजी की जरूरत है. लेकिन सरकार इस अतिरिक्त पूंजी को देने से पहले ही इनकार कर चुकी है.

रिजर्व बैंक की ओर से फरवरी 2018 में जारी एक सर्कुलर में यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया था कि कारपोरेट को कर्ज चुकाने में अगर 1 दिन की भी चूक होती है तो उसे डिफाल्टर मान कर रकम को एनपीए घोषित किया जाएगा. इसे ‘वन-डे डिफॉल्ट नॉर्म’ कहा गया. इसे 1 मार्च से लागू किया गया था. इसी सर्कुलर में रिजर्व बैंक ने कंपनियों को बैंकों के साथ पिछले सभी पुनर्भुगतान संबंधी मसलों को सुलझाने के लिए 1 मार्च, 2018 से 180 दिन का वक्त दिया था, जिसमें नाकाम रहने पर उनके संबंधित खातों को दिवालिया घोषित किए जाने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए बाध्य किया जा सकेगा. हालांकि 27 अगस्त को यह मियाद समाप्त हो गई है. अभी तक आरबीआई की ओर से कोई सूचना नहीं दी गई है. हालांकि गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों को इस नियम से फौरी तौर पर राहत देने की बात कही गई है.

आरबीआई के इस सर्कुलर के अनुसार सितंबर में 70 कंपनियों के खिलाफ दिवालिया घोषित किये जाने की कार्यवाही शुरू की जा सकती है. इन कंपनियों पर बैंकों के 3.5 से 4 लाख करोड़ के कर्ज हैं. इन छह महीनों में इन कंपनियों ओर बैंको ने अपने आपस के विवाद निपटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए. सर्कुलर में 200 करोड़ से अधिक बकाये वाली कंपनियों से 20 फीसदी रकम लेकर रिस्ट्रक्चरिंग की बैंको को छूट दी गयी थी, लेकिन बाद में इस प्लान को लेकर कोई सहमति नही बन पाई.

बता दें कि आरबीआई के इस सर्कुलर से भारत की पावर सेक्टर की कंपनियां सबसे अधिक प्रभावित होने जा रही हैं. पहली मार्च को जिन 81 कंपनियों ने डिफॉल्ट किया था इनमें 38 अकेले पावर सेक्टर की हैं. अडानी पॉवर ओर टाटा पावर जैसी बड़ी कंपनियां दीवालिया होने जा रही हैं. बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के अनुसार बिजली कंपनियों पर 2.6 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है, जिसमें बड़े पैमाने पर रकम एनपीए होने की संभावना है.

इन पावर कंपनियों ने अपने एनपीए पर आरबीआई के इस सर्कुलर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पावर सेक्टर के एनपीए पर आरबीआई के 12 फरवरी को जारी सर्कुलर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. डिफॉल्टर कंपनियों की सूची में 43 कंपनियां नॉन-पावर सेक्टर की भी है. अनिल अंबानी समूह की रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग (अब रिलायंस नेवल), पुंज लॉयड, बजाज हिंदुस्तान, मुंबई रेयान, जीटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर, रोल्टा इंडिया, श्रीराम ईपीसी, ऊषा मार्टिन, एस्सार शिपिंग और गीतांजलि जेम्स जैसी कंपनियों पर अरबों रुपये का कर्ज बकाया है. अडानी समूह और अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेंस जैसी कुल 70 कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर खड़ी है. इन कम्पनियों को दिवालिया घोषित कर दिए जाते ही एक झटके में भारत की बैंकिंग व्यवस्था और शेयर बाजार धराशायी हो सकते हैं.

Report By Udaipur Kiran

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