12 साल की उम्र में दिया पहला सोलो परफॉर्मेंस, अमजद अली खान ऐसे बने ‘सरोद सम्राट’

Mumbai , 8 अक्टूबर . भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद अमजद अली खान का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है. उनकी उंगलियों से निकलने वाली सरोद की धुन में भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई होती थी. साथ ही एक अलग तरह की मिठास सुनाई देती है. उनका संगीत सफर कई दशकों का रहा और उन्होंने अपने परिवार की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक अलग पहचान बनाई.

अमजद अली खान का जन्म 9 अक्टूबर 1945 को Madhya Pradesh के ग्वालियर में हुआ था. वह मशहूर सरोद वादक उस्ताद हाफिज अली खान के सबसे छोटे बेटे हैं. उनके पिता ग्वालियर के राजघराने के दरबार से जुड़े संगीतकार थे. उनका बचपन संगीत के बीच बीता. सरोद बचपन से ही उनके जीवन का हिस्सा बन गया. उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपने पिता से सरोद सीखना शुरू कर दिया था. उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सिर्फ 12 साल की उम्र में अपना पहला सोलो परफॉर्मेंस दिया था.

इसके बाद उन्होंने लगातार अभ्यास और मंच पर प्रदर्शन के जरिए अपनी एक अलग शैली बनाई. उन्हें आगे चलकर ‘सरोद सम्राट’ के नाम से पहचान मिली. उनकी खासियत यह रही कि उन्होंने परंपरागत तकनीक को बनाए रखते हुए सरोद की प्रस्तुति में अपनी व्यक्तिगत शैली भी जोड़ी. उनका संगीत देश के अलग-अलग हिस्सों में गूंजा. इसके अलावा, उन्होंने दुनिया के कई मंचों पर भारतीय शास्त्रीय संगीत को प्रस्तुत किया. विदेशी लोगों के बीच भी उन्होंने सरोद को पहचान दिलाया. उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को भी संगीत की शिक्षा दी और अलग-अलग विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर काम किया.

उन्होंने शास्त्रीय संगीत के अलावा बच्चों के लिए वोकल और ऑर्केस्ट्रल म्यूजिक भी तैयार किया.

अमजद अली खान की उपलब्धियों की बात करें तो उन्हें देश और विदेश में कई बड़े सम्मान मिले. उन्हें 1970 में यूनेस्को सम्मान, 1975 में पद्म श्री, 1989 में संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, 1991 में पद्म भूषण और 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. उन्हें कई विश्वविद्यालयों ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी दी. संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप भी मिली.

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पीके/