
New Delhi, 15 सितंबर . हिंदी को लेकर अक्सर एक बहस सुनने के लिए मिलती है कि हिंदी का शुद्ध रूप क्या है? कौन-सा शब्द हिंदी का है और कौन-सा नहीं? क्या अंग्रेजी या दूसरी भारतीय भाषाओं के शब्दों के इस्तेमाल से हिंदी कमजोर हो रही है? क्या social media और रोमन लिपि हिंदी के भविष्य के लिए चुनौती बन रहे हैं? इन सवालों पर पत्रकार और लेखक अनंत विजय की राय कुछ अलग है. उन्होंने से बात करते हुए कहा कि हिंदी को शुद्ध और अशुद्ध के खांचे में बांटना ही सही तरीका नहीं है. हिंदी में शुद्ध-अशुद्ध जैसा कुछ नहीं, बल्कि परिचित और अपरिचित शब्द होते हैं.
अनंत विजय हिंदी को एक बहती हुई नदी की तरह देखते हैं. उनके अनुसार हिंदी का विकास हमेशा दूसरी भाषाओं और बोलियों से शब्द ग्रहण करते हुए हुआ है. यही उसकी ताकत भी है. हिंदी ने संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, उर्दू, अंग्रेजी और देश की अलग-अलग बोलियों से शब्द लिए और उन्हें अपने इस्तेमाल का हिस्सा बनाया.
वह कहते हैं कि किसी भाषा का दूसरी भाषाओं से शब्द लेना उसके कमजोर होने का संकेत नहीं है. दुनिया की लगभग हर बड़ी भाषा का विकास इसी तरह हुआ है. अंग्रेजी में भी भारतीय भाषाओं के कई शब्द इस्तेमाल होते हैं. ‘जंगल’ और ‘बंदोबस्त’ जैसे शब्द इसके उदाहरण हैं. ऐसे में हिंदी में दूसरी भाषाओं के शब्दों की मौजूदगी को भाषा का क्षरण मानना उचित नहीं है.
उनके मुताबिक हिंदी को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि कोई शब्द लोगों की जिंदगी और बोलचाल में किस तरह शामिल हो गया है. अगर कोई शब्द लोगों के बीच लगातार इस्तेमाल हो रहा है और उसका अर्थ आसानी से समझा जा रहा है तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह किसी दूसरी भाषा से आया है.
हिंदी में संस्कृत से आए कई ऐसे शब्द हैं जिन्हें आज के पाठक कठिन मान सकते हैं. लेकिन कठिन या अपरिचित शब्द को अशुद्ध कहना ठीक नहीं है. अनंत विजय इसी फर्क पर जोर देते हैं.
उनके अनुसार किसी शब्द का इस्तेमाल कम होने से वह गलत नहीं हो जाता. हो सकता है कि वह शब्द पाठक के लिए नया हो या उसकी रोजमर्रा की भाषा में इस्तेमाल न होता हो. इसलिए ‘शुद्ध हिंदी’ की जगह ‘परिचित हिंदी’ और ‘अपरिचित हिंदी’ का फर्क ज्यादा व्यावहारिक है.
यही वजह है कि साहित्य की भी भाषा के विकास में बड़ी भूमिका होती है. लेखक जब ऐसे शब्दों को अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करते हैं जो आम बोलचाल से बाहर हो चुके हैं, तो वे शब्द फिर से लोगों की नजर में आते हैं. प्रेमचंद, निराला, अज्ञेय और दिनकर जैसे साहित्यकारों ने हिंदी के शब्द संसार को व्यापक बनाया.
भाषा समय के साथ नए विषयों और नई तकनीकों के लिए शब्द भी अपनाती है. आज कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल, माउस जैसे शब्द हमारी रोजमर्रा की हिंदी का हिस्सा हैं. इनके लिए जबरन ऐसे शब्द बनाने की कोशिश, जिन्हें आम लोग समझ ही न पाएं, भाषा को सहज बनाने के बजाय मुश्किल बना सकती है.
अनंत विजय के अनुसार दुनिया लगातार बदल रही है. नई तकनीक आएगी तो उसके साथ नए शब्द भी आएंगे. इसलिए भाषा को हमेशा पुराने शब्दों के दायरे में बंद नहीं किया जा सकता. भाषा का काम लोगों तक विचार और जानकारी पहुंचाना है. अगर कोई शब्द समाज में सहज रूप से स्वीकार हो गया है तो उसके इस्तेमाल को केवल ‘शुद्धता’ के पैमाने पर नहीं परखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि हिंदी की पहचान देवनागरी से भी जुड़ी हुई है. ऐसे में रोमन लिपि में हिंदी लिखने का बढ़ता चलन चिंता का विषय है. आज social media, चैट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोग हिंदी को अंग्रेजी के अक्षरों में लिखते हैं. यह तरीका बातचीत को आसान बना सकता है, लेकिन लंबे समय में देवनागरी पढ़ने-लिखने की आदत पर इसका असर पड़ सकता है. खासकर फिल्मी पटकथा, टेलीप्रॉम्प्टर और कुछ डिजिटल माध्यमों में रोमन हिंदी का इस्तेमाल दिखाई देता है. ऐसे प्रयोगों को केवल सुविधा के नाम पर स्वीकार करने के बजाय देवनागरी के समर्थकों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.
अनंत विजय का मानना है कि social media पर इस्तेमाल होने वाली भाषा को हिंदी का अंतिम या सही रूप नहीं माना जा सकता. वहां एक तरफ हिंदी को बिगाड़कर लिखने वाले लोग हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो हिंदी को बहुत अच्छे तरीके से लोगों तक पहुंचा रहे हैं.
उनके मुताबिक भाषा का भविष्य केवल social media के ट्रेंड से तय नहीं होगा. टेलीविजन, सिनेमा, साहित्य, शिक्षा और जनसंचार माध्यम भी हिंदी के स्वरूप को प्रभावित करते हैं. ‘कौन बनेगा करोड़पति’, ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे कार्यक्रमों ने हिंदी के कई शब्दों और मुहावरों को आम लोगों तक पहुंचाया. अमिताभ बच्चन की भाषा भी लंबे समय तक दर्शकों के लिए हिंदी के आकर्षण का हिस्सा रही है.
अनंत विजय के अनुसार हिंदी के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती स्कूल शिक्षा से जुड़ी है. जब तक बच्चों की शुरुआती और उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं की मजबूत मौजूदगी नहीं होगी, तब तक हिंदी को रोजगार, उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में स्थापित करना मुश्किल रहेगा. उनका मानना है कि हिंदी केवल भावनाओं, साहित्य या मनोरंजन की भाषा बनकर नहीं रह सकती. उसे विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, रोजगार और शोध की भाषा भी बनना होगा.
–
पीआईएम/एएस
Skip to content