
New Delhi, 23 अक्टूबर . Prime Minister Narendra Modi ने Friday को social media पर एक सुभाषित शेयर किया है, जिसमें दुख और भय को दूर करने का संदेश दिया गया है.
पीएम मोदी की ओर से संस्कृत श्लोक, “यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्. य एतत्समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिताः॥” शेयर किया गया है, जिसका हिंदी भावार्थ है कि जब तक मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र नहीं समझता, तब तक वह अपने से अधिक प्रभुत्वशाली शक्ति के भय में जीता रहता है. इस विचार को स्वीकार करने वाले लोग भय और दुख से घिरे रहते हैं तथा भ्रमित हो जाते हैं. वास्तव में, स्वतंत्रता का महत्व इसी में है कि मनुष्य भय और पराधीनता से मुक्त होकर आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सके.
Prime Minister की ओर से साझा किया गया यह श्लोक श्रीमद्भागवत महापुराण के 11वें स्कंध के 10वें अध्याय का 33वां श्लोक है, जो उद्धव गीता का हिस्सा है. इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण उद्धव को जीव की पराधीनता (परतंत्रता) और उसके कारण उत्पन्न होने वाले भय व मोह के बारे में समझा रहे हैं.
भगवान कहते हैं कि जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर, मन और अहंकार के स्तर पर देखता है, वह प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के अधीन रहता है. यह आध्यात्मिक परतंत्रता है, जहां व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों और अपने कर्मों का दास बन जाता है. जो व्यक्ति खुद को कर्ता मानता है और संसार के द्वंद्वों (सुख-दुख, लाभ-हानि) में फंसा रहता है, वह हमेशा ‘काल’ (मृत्यु या अदृश्य दैवीय शक्ति) से डरता रहता है कि कब उसका सब कुछ छिन न जाए.
भगवान कहते हैं कि इस अनित्य संसार और शारीरिक पहचान (अहंकार) को ही जो अपना सर्वस्व मान बैठते हैं, वे कभी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाते. वे निरंतर चिंताओं, दुखों और मोह के जाल में फंसे रहते हैं. यानी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीव जब तक अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को भूलकर माया के अधीन रहता है, वह दुखी रहेगा. वास्तविक स्वतंत्रता और निर्भयता केवल आत्मज्ञान या ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से ही संभव है.
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एसडी/एएस
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