सावरकर लोकतंत्र को मानते थे सबसे बेहतर, दस्तावेजों से सामने आती है अलग तस्वीर : भारतीय-अमेरिकी रिसर्चर (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

शिकागो, 5 अक्टूबर . भारत, ब्रिटेन और अमेरिका के अलग-अलग आर्काइव में एक दशक से ज्यादा समय तक रिसर्च करने के बाद भारतीय-अमेरिकी विद्वान श्रीधर डी. दामले ने विनायक दामोदर सावरकर को लेकर एक अलग तस्वीर पेश की है. उनका कहना है कि उनकी रिसर्च में सामने आया सावरकर का व्यक्तित्व उस Political छवि से काफी अलग है, जो आधुनिक India की इस चर्चित और विवादित शख्सियत के इर्द-गिर्द बनाई गई है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लंबे समय से रिसर्च कर रहे दामले, सावरकर पर अपनी एक किताब ल‍िख रहे हैं. इसके लिए उन्होंने हजारों पन्नों के पुराने दस्तावेजों का अध्ययन किया है. इनमें ब्रिटिश खुफिया विभाग के रिकॉर्ड, अमेरिकी राजनयिक दस्तावेज, प्रतिबंधित साहित्य, अदालत से जुड़े दस्तावेज और भारतीय Police की फाइलें शामिल हैं.

को करीब एक घंटे के इंटरव्यू में दामले ने बताया कि उन्होंने 2010 में इस विषय पर रिसर्च शुरू की थी. बाद में उनका काम भारत, ब्रिटेन, अमेरिका और दूसरी जगहों के आर्काइव और दस्तावेजों तक पहुंचा. उन्होंने कहा कि अब तक वह 30,000 से ज्यादा पन्नों का रिकॉर्ड जुटा चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि उस समय की Governmentें, राजनयिक, Police और दूसरे लोग सावरकर को किस नजर से देखते थे.

दामले ने कहा, “आजादी की लड़ाई में सावरकर एक अलग तरह की शख्सियत थे. वह समाज सुधारक भी थे और उनका नजरिया वैज्ञानिक सोच वाला भी था.” उन्होंने सावरकर को दूरदर्शी, व्यावहारिक राजनेता और आदर्शवादी बताया.

दामले अपनी रिसर्च में 1906 के एक दस्तावेज को खास तौर पर अहम मानते हैं, जो सावरकर के लंदन में रहने के समय का है. उनके मुताबिक, इसकी एक कॉपी ब्रिटिश अधिकारियों की ओर से जब्त किए गए दस्तावेजों में बच गई थी. बाद में उन्हें यह शिकागो यूनिवर्सिटी में माइक्रोफिल्म पर मिली.

दामले के मुताबिक, इस दस्तावेज में एक ऐसे आजाद India की कल्पना की गई थी, जहां लोकतंत्र हो, कानून के सामने सभी बराबर हों, सरकारी नौकरियां योग्यता के आधार पर मिलें और हर व्यक्ति को एक वोट का अधिकार हो. उन्होंने कहा कि भविष्य में देश में President हो या राजा, इसका फैसला संविधान सभा पर छोड़ने की बात भी इसमें थी.

दामले ने दस्तावेज के बारे में कहा, “India आजाद होगा, वहां लोकतंत्र होगा, एक व्यक्ति का एक वोट होगा, कानून के सामने सभी बराबर होंगे और नौकरी योग्यता के आधार पर मिलेगी.”

84 साल के दामले के मुताबिक, यह दस्तावेज सावरकर को समझने के लिए बेहद अहम है, क्योंकि उन्हें अक्सर बाद के वर्षों में हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद, देश के बंटवारे और महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ी बहसों के नजरिए से ही देखा जाता है.

दामले का कहना है कि सावरकर के विचारों को उनके जीवन के अलग-अलग दौर के हिसाब से समझना चाहिए. इनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी के तौर पर उनका समय, अंडमान द्वीप में कैदी के रूप में बिताए साल, रत्नागिरी में पाबंदियों के बीच उनका जीवन और बाद में हिंदू महासभा के नेता के तौर पर उनकी भूमिका शामिल है.

दामले ने जेल से ब्रिटिश अधिकारियों को लिखी गई सावरकर की याचिकाओं को सिर्फ अंग्रेजों के सामने झुकने के तौर पर पेश किए जाने पर भी सवाल उठाया. उनका कहना है कि इन याचिकाओं को उस समय की जेल व्यवस्था और ब्रिटिश Government की ओर से सावरकर पर लागू की गई कानूनी कैटेगरी के हिसाब से समझना चाहिए.

दामले के मुताबिक, सावरकर ने एक कैदी के तौर पर अपनी मांगें रखी थीं और इससे जुड़े सभी छह दस्तावेज मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी मांगों को स्वीकार नहीं किया था.

दामले ने सावरकर के तर्क का जिक्र करते हुए कहा कि अगर ब्रिटिश अधिकारी उन्हें सामान्य अपराधी मानते हैं, तो उन्हें सामान्य कैदियों को मिलने वाले अधिकार दिए जाने चाहिए. वहीं, अगर उन्हें Political कैदी माना जाता है, तो उन्हें Political कैदियों से जुड़े अधिकार मिलने चाहिए.

दामले की रिसर्च का एक बड़ा हिस्सा महात्मा गांधी की हत्या के मामले से भी जुड़ा है. इस मामले में सावरकर पर मुकदमा चला था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था. दामले के मुताबिक, उन्होंने जिन पुराने दस्तावेजों को देखा है, उनमें Police जांच की शुरुआती रिपोर्ट और Government के मुख्य वकील से जुड़ी बातचीत का एक अमेरिकी राजनयिक रिकॉर्ड भी शामिल है.

दामले ने बताया कि उन्हें वॉशिंगटन में एक ऐसी रिपोर्ट मिली, जिसमें दर्ज था कि मुकदमे के शुरुआती दौर में मुख्य वकील ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि सावरकर के खिलाफ पर्याप्त आधार नहीं होने की वजह से उनके जल्द रिहा होने की संभावना है.

दामले ने उस दस्तावेज के बारे में बताते हुए कहा, “दफ्तरी ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि सावरकर बहुत जल्द रिहा हो जाएंगे, क्योंकि उनके खिलाफ कोई पर्याप्त आधार नहीं है.”

दामले का मानना है कि आर्काइव में मौजूद दस्तावेज गांधी की हत्या में सावरकर की व्यक्तिगत भूमिका तय करने की कोशिशों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. उन्होंने सावरकर और हत्या में शामिल उनके समर्थकों के बीच फर्क बताते हुए कहा कि सिर्फ Political जुड़ाव के आधार पर किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती.

दामले अपनी रिसर्च में सावरकर को आजादी के बाद लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले व्यक्ति के तौर पर भी पेश करते हैं. इसके लिए वह अपने निजी अनुभव का भी जिक्र करते हैं.

दामले ने बताया कि कॉलेज छात्र रहते हुए वह 14 जनवरी 1960 को सावरकर से मिले थे. उन्होंने एक जीवनी में सावरकर के बारे में लिखी गई आपत्तिजनक टिप्पणी की ओर उनका ध्यान दिलाया था. दामले को उम्मीद थी कि यह मुलाकात सिर्फ कुछ मिनट की होगी, लेकिन सावरकर ने उनके साथ करीब एक घंटे तक बातचीत की.

दामले ने सावरकर के साथ हुई अपनी बातचीत को याद करते हुए बताया कि उन्होंने उनसे पूछा था कि उन्होंने केरल की चुनी हुई कम्युनिस्ट Government को हटाए जाने की आलोचना क्यों की थी. दामले के मुताबिक, सावरकर का जवाब था कि अगर लोकतंत्र को स्वीकार किया गया है, तो चुनाव के नतीजों को भी स्वीकार करना होगा और Government बदलने का तरीका चुनाव होना चाहिए, न कि Government को किसी दूसरे तरीके से हटाना.

दामले ने सावरकर के शब्दों को याद करते हुए कहा, ‘Government चलाने की सभी व्यवस्थाओं में लोकतंत्र सबसे बेहतर तरीका है.’

दामले के मुताबिक, सावरकर का यह भी मानना था कि आजादी के बाद एक लोकतांत्रिक देश में गुप्त Political संगठनों और Political हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

दामले की रिसर्च सावरकर के एक ऐसे पहलू पर भी रोशनी डालती है, जिसके बारे में आम तौर पर कम चर्चा होती है. उनके मुताबिक, सावरकर अज्ञेयवादी और तर्कवादी थे. वह धार्मिक ग्रंथों को ऐसी चीज नहीं मानते थे, जिन पर बिना सवाल किए विश्वास किया जाए, बल्कि उनका मानना था कि इन्हें इंसानों ने ही बनाया है.

दामले ने कहा, “उनका मानना था कि सभी धर्म इंसानों ने बनाए हैं और सभी धार्मिक ग्रंथ भी इंसानों द्वारा ही लिखे गए हैं.”

दामले के मुताबिक, सावरकर India की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते थे, लेकिन उनका मानना था कि किसी भी बात को परखने का आखिरी आधार विज्ञान और इंसानों की भलाई होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “आखिरी फैसला विज्ञान का होना चाहिए, ऐसा विज्ञान जो इंसानों की भलाई पर आधारित हो.”

सावरकर का यह नजरिया हिंदुत्व और हिंदू संगठन को लेकर उनके विचारों के साथ-साथ चलता था. दामले के मुताबिक, सावरकर का मानना था कि India में अल्पसंख्यकों को बराबर की नागरिकता, अपने धर्म को मानने की आजादी और अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार मिलना चाहिए. साथ ही वे सभी एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र का हिस्सा रहें.

दामले ने कहा कि सावरकर India के बंटवारे के खिलाफ थे और उन्हें डर था कि कांग्रेस आखिर में विभाजन को स्वीकार कर सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि पुराने दस्तावेजों और प्रकाशित सामग्री में विभाजन के मुद्दे पर सावरकर और बी.आर. आंबेडकर के बीच हुए विचारों के आदान-प्रदान का जिक्र मिलता है.

दामले की आने वाली किताब में राष्ट्रीय सुरक्षा और दुनिया की राजनीति को लेकर सावरकर की सोच पर भी चर्चा होगी. दामले के मुताबिक, सावरकर ने बाद के वर्षों में चीन को लेकर चेतावनी दी थी और तिब्बत में हो रहे बदलावों से India की सुरक्षा पर पड़ने वाले असर की बात भी की थी. वह India की सुरक्षा के लिए बीच में मौजूद ‘बफर स्टेट्स’ को अहम मानते थे.

दामले की रिसर्च उन्हें दूसरे देशों में चल रहे उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों से जुड़े कई पुराने दस्तावेजों तक भी ले गई. आयरिश-अमेरिकी साप्ताहिक अखबार ‘गेलिक अमेरिकन’ की फाइलों में उन्हें सावरकर के लंदन के समय के कुछ लेख मिले.

इनमें भारतीय मुसलमानों से आजादी की लड़ाई में शामिल होने की अपील, खालसा पर लिखा एक लेख और उपनिवेशवाद का सामना कर रहे देशों और लोगों से साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील शामिल थी.

दामले के मुताबिक, इन दस्तावेजों से भारतीय राष्ट्रवाद और दुनिया के दूसरे हिस्सों में चल रहे उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के बीच संबंधों का पता चलता है. उनका कहना है कि सावरकर को लेकर आम तौर पर होने वाली चर्चाओं में इस पहलू पर कम ध्यान दिया गया है.

दामले अपनी किताब पूरी करने से पहले अभी कुछ और दस्तावेज हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. इनमें Mumbai सीआईडी से जुड़ी सामग्री भी शामिल है. दामले ने बताया कि उन्होंने सावरकर से जुड़े करीब 850 पन्नों का पता लगाया है, लेकिन उन दस्तावेजों की कॉपी हासिल करने में मुश्किल आ रही है, जिन्हें उनके मुताबिक रिसर्च करने वालों के लिए उपलब्ध होना चाहिए. उन्होंने कहा, “समस्या अभी भी ब्यूरोक्रेसी की है.”

जिन दस्तावेजों को दामले हासिल करना चाहते हैं, उनमें 1950 में सावरकर की गिरफ्तारी से जुड़ा चार पन्नों का एक सीआईडी दस्तावेज भी शामिल है.

दामले का मकसद सिर्फ एक किताब प्रकाशित करना नहीं है. रिसर्च पूरी होने के बाद वह अपने जुटाए हुए दस्तावेजों को ऑनलाइन उपलब्ध कराना चाहते हैं, ताकि छात्र, पत्रकार और आम पाठक भी उन्हें देख सकें. उन्होंने कहा, “जैसे ही मुझे सारे दस्तावेज मिल जाएंगे, मेरा लक्ष्य अपनी पूरी डॉक्यूमेंटेशन को ऑनलाइन उपलब्ध कराना है.”

दामले का कहना है कि सावरकर के समाज सुधार से जुड़े काम पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. उन्होंने छुआछूत और जाति की दीवारों के खिलाफ सावरकर के अभियान, अंतरजातीय विवाह और दोबारा धर्म में वापसी के समर्थन का जिक्र किया. दामले के मुताबिक, सावरकर ने मराठी भाषा में आधुनिक जीवन से जुड़े शब्दों को आम लोगों तक पहुंचाने की भी कोशिश की और आधुनिक सार्वजनिक जीवन के लिए कई आसान शब्द तैयार किए.

दामले का मानना है कि सावरकर के व्यक्तित्व को न तो सिर्फ उनके समर्थकों की तारीफ के आधार पर समझा जा सकता है और न ही विरोधियों की आलोचना के आधार पर.

उनका कहना है कि उनकी रिसर्च में सावरकर एक ऐसे Political व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं, जिनके विचार समय और हालात के साथ बदलते रहे, लेकिन राष्ट्रीय एकता, आधुनिक विकास, विज्ञान, समाज सुधार, सैन्य तैयारी और लोकतांत्रिक Government जैसे मुद्दे उनकी सोच में बार-बार दिखाई देते रहे.

श्रीधर दामले अमेरिका में रहने वाले स्वतंत्र रिसर्चर हैं और उन्हें आरएसएस पर उनके काम के लिए खास तौर पर जाना जाता है. उन्होंने वाल्टर के. एंडरसन के साथ मिलकर ‘द ब्रदरहुड इन सैफ्रन: द राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एंड हिंदू रिवाइवलिज्म’ किताब लिखी थी. कई साल बाद दोनों ने ‘द आरएसएस: ए व्यू टू द इनसाइड’ भी लिखी, जिसमें आरएसएस के इतिहास, संगठन और समय के साथ उसमें आए बदलावों का अध्ययन किया गया.

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 1883 में हुआ था. वह भारतीय क्रांतिकारी, लेखक और Political नेता थे. ब्रिटिश शासन के दौरान उन्होंने कई साल जेल में बिताए, जिसमें अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल भी शामिल थी.

बाद में वह हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और हिंदुत्व की विचारधारा के प्रमुख समर्थकों में शामिल रहे. 1948 में महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ी साजिश के मामले में उन पर आरोप लगाए गए थे, लेकिन मुकदमे में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था. सावरकर का 1966 में Mumbai में निधन हुआ.

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एवाई/एएस