
New Delhi, 27 सितंबर . ‘उन्हें यह फिक्र है हरदम, नयी तर्ज-ए-जफा क्या है? हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?” ये पंक्तियां लिखने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था. एक ऐसा नाम, जो सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि हिंदुस्तान के हर युवा के दिल में धड़कता हुआ जज्बा है.
भगत सिंह का जन्म अविभाजित India के पंजाब प्रांत के बंगा गांव में हुआ था, जो अब Pakistan में है. उनके पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर एक किसान परिवार से थे लेकिन परिवार में देशभक्ति पहले से ही थी. उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह बड़े क्रांतिकारी थे.
कहा जाता है कि जब 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, तब भगत सिंह सिर्फ 12 साल के थे. इस खबर ने उनके बाल मन को झकझोर दिया. वे अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे और वहां की मिट्टी को मुट्ठी में भरकर ले आए. यहीं से उनके अंदर अंग्रेजों के खिलाफ आग भड़क उठी.
उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और 1926 में ‘नौजवान India सभा’ की स्थापना की. पहले वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित थे लेकिन 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद गांधी जी द्वारा आंदोलन वापस लेने से वे निराश हुए. उन्हें लगा कि अहिंसा से आजादी नहीं मिलेगी. इसके बाद वे सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर चल पड़े और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाले ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ से जुड़ गए, जिसे बाद में उन्होंने ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (एचएसआरएल) नाम दिया.
1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में अंग्रेज अफसर जे.पी. सांडर्स को गोली मार दी. अंग्रेजी हुकूमत हिल गई. इसके बाद उनका सबसे चर्चित कदम था- 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंकना रहा. मकसद किसी को मारना नहीं था बल्कि ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाका करना’ था. बम ऐसी जगह फेंका गया जहां कोई मौजूद न था. धुएं से हॉल भर गया और उन्होंने खुद ही ‘इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के नारे लगाते हुए पर्चे फेंके. वे चाहते तो भाग सकते थे लेकिन उन्होंने जानबूझकर गिरफ्तारी दी.
लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह करीब 2 साल रहे लेकिन जेल भी उनके लिए क्रांति का मंच बन गई. उन्होंने जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के खिलाफ 116 दिन तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल की, जिसमें उनके साथी यतींद्रनाथ दास ने शहादत दे दी.
जेल में ही उन्होंने कई लेख लिखे. उनका प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ आज भी युवाओं को सोचने पर मजबूर करता है. वे हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेजी और बांग्ला जानते थे. फांसी से पहले तक वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे.
26 अगस्त 1930 को अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया और 7 अक्टूबर 1930 को फांसी की सजा सुनाई. पूरे देश में माफी की अपीलें हुईं, गांधी जी ने भी वायसराय से बात की लेकिन भगत सिंह खुद माफी नहीं चाहते थे. उन्होंने कहा था कि उनकी शहादत सोए हुए देश को जगा देगी.
23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई. कहा जाता है कि फांसी के समय वे तीनों ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गा रहे थे. अंग्रेज इतने डरे हुए थे कि उन्होंने आंदोलन के डर से उनके शवों को बोरियों में भरकर फिरोजपुर ले जाकर चुपके से जलाने की कोशिश की लेकिन ग्रामीणों ने देख लिया और उनके अधजले शवों का विधिवत अंतिम संस्कार किया.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं, एक ऐसी हुकूमत जिसके राज में सूरज कभी डूबता नहीं था, वो सिर्फ 23 साल के एक नौजवान से थर-थर कांपती थी. भगत सिंह ने कहा था, “सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते, सुधार होते हैं युवाओं के परिश्रम, साहस और बलिदान से.” आज इतने साल बाद भी उनका यही साहस India के युवाओं को प्रेरणा देता है.
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एससीएच/पीएम
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