
New Delhi, 10 अक्टूबर . पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, पूर्व राजदूतों और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों सहित पूर्व सिविल सेवकों के एक समूह ने India की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का बचाव करते हुए संयुक्त खुला पत्र जारी किया है. पत्र में चुनावों में धांधली के आरोपों को बिना सबूत लगाए जाने पर सवाल उठाते हुए नागरिकों से चुनावी व्यवस्था में स्थापित बहुदलीय सुरक्षा उपायों पर भरोसा करने, Supreme Court के फैसलों का सम्मान करने और मतदाता सूची की जांच करने की अपील की गई है.
पत्र में कहा गया है कि चुनावों को ‘रिग्ड’ यानी धांधली से प्रभावित बताने के लिए बिना सबूत इस शब्द का बार-बार इस्तेमाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के भरोसे को नुकसान पहुंचाता है. पत्र लिखने वाले अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे करियर में India के चुनावों का संचालन किया है या उनका अध्ययन किया है. उन्होंने मतदाता सूची तैयार करने, मतदान कर्मियों को प्रशिक्षित करने, स्ट्रॉन्ग रूम सील करने और मतगणना की निगरानी जैसे कार्य किए हैं.
पत्र के मुताबिक, इन अधिकारियों का किसी Political दल से संबंध नहीं है और वे अपने अनुभव के आधार पर चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा व्यवस्था को सामने रखना चाहते हैं.
पूर्व अधिकारियों ने पुराने चुनावों में बूथों पर हथियारबंद लोगों की मौजूदगी, बाहुबलियों के समर्थकों की गतिविधियों, मतपेटियों में अवैध तरीके से मतपत्र डालने, मतपेटियां चुराने और मतदाताओं को मतदान से रोकने जैसी घटनाओं का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि बूथ कैप्चरिंग की समस्या इतनी गंभीर थी कि संसद ने 1989 में इसे अपराध घोषित किया.
पत्र में दावा किया गया कि कभी बूथ कैप्चरिंग के लिए पहचाने जाने वाले बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव बिना किसी पुनर्मतदान के संपन्न हुआ, जो राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ. इसमें यह भी कहा गया कि 1951 के बाद बिहार में सबसे अधिक मतदान हुआ और महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया.
पत्र में कहा गया है कि चुनावी प्रक्रिया में कई स्तरों पर निगरानी और सुरक्षा के इंतजाम हैं. प्रत्येक उम्मीदवार का एजेंट मतदान केंद्र पर मौजूद रह सकता है और मतदान में पड़े मतों की हस्ताक्षरित गणना प्रति अपने साथ ले जाता है. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को एजेंटों के हस्ताक्षर के साथ सील किया जाता है और स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखा जाता है, जहां उम्मीदवारों के एजेंट निगरानी कर सकते हैं. मशीनों की गिनती और कागजी पर्चियों के मिलान की व्यवस्था भी सुरक्षा उपायों का हिस्सा है, जिसे Supreme Court ने 2024 में बरकरार रखा था.
पूर्व अधिकारियों ने तर्क दिया कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली करने के लिए अलग-अलग Political दलों की Governmentों के अधीन काम करने वाले हजारों अधिकारियों और हारने वाले दलों के एजेंटों की मिलीभगत जरूरी होगी. पत्र में कहा गया कि ऐसी किसी साजिश को अब तक साबित नहीं किया गया है.
पत्र में चुनाव आयोग की संरचना का उल्लेख करते हुए कहा गया कि आयोग को बहुसदस्यीय निकाय बनाया गया था, ताकि चुनाव से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों की शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित न रहे. Supreme Court ने 1995 में इस व्यवस्था को बरकरार रखा था. पत्र के अनुसार, तीनों चुनाव आयुक्त विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हैं.
पूर्व अधिकारियों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का बचाव करते हुए कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की प्रक्रिया का हिस्सा है. उन्होंने माना कि इस तरह की बड़ी प्रक्रिया में कुछ असुविधाएं हो सकती हैं, लेकिन इसे Political संबद्धता के आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए.
पत्र में कहा गया कि इसी चुनाव आयोग के कार्यकाल में केंद्र में सत्तारूढ़ दल Himachal Pradesh, कर्नाटक, तेलंगाना, Jharkhand और जम्मू-कश्मीर में चुनाव हार चुका है. वर्ष 2024 के Lok Sabha चुनाव में भी उसे अपने दम पर बहुमत नहीं मिला. पत्र के अनुसार, जीत के समय चुनावी व्यवस्था को निष्पक्ष और हार के बाद धांधलीपूर्ण बताना उचित नहीं है.
पत्र में कहा गया कि बिहार की मतदाता सूची का पिछला गहन पुनरीक्षण 2003 में हुआ था. वर्ष 2025 के पुनरीक्षण के दौरान लगभग 22 लाख मृत मतदाताओं, सात लाख दोहराव वाली प्रविष्टियों और स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लाखों लोगों के नाम सामने आए.
पूर्व अधिकारियों ने कहा कि मतदाता सूची में ऐसे नाम बने रहने से फर्जी मतदान की आशंका पैदा होती है. उनके अनुसार, मतदाता सूची को दुरुस्त करने का उद्देश्य मतदाताओं को बाहर करना नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय बनाना है.
पत्र में स्पष्ट किया गया कि मसौदा मतदाता सूची अस्थायी होती है और उसमें किसी नाम का नहीं होना अपने आप में उस नाम को अंतिम रूप से हटाया जाना नहीं है. किसी मतदाता का नाम बिना नोटिस और सुनवाई के नहीं हटाया जा सकता. इसके बाद अपील के दो स्तर भी उपलब्ध हैं. प्रत्येक Political दल बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) के साथ अपने एजेंट तैनात कर सकता है.
पत्र के मुताबिक, पुनरीक्षण के दौरान मृत और दोहराव वाले नाम हटाए जाने के साथ लगभग 21.5 लाख नए मतदाताओं को भी जोड़ा गया.
पत्र में एसआईआर को लेकर Supreme Court की भूमिका का भी जिक्र किया गया. पूर्व अधिकारियों के अनुसार, अदालत ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन इसके प्रत्येक चरण की निगरानी की. अदालत ने मसौदा मतदाता सूची से बाहर रखे गए सभी 65 लाख लोगों के नाम और उन्हें बाहर रखने के कारण प्रकाशित करने का निर्देश दिया.
पत्र में कहा गया कि Supreme Court ने ऑनलाइन दावे दाखिल करने की अनुमति दी, पहचान के प्रमाण के रूप में आधार को स्वीकार करने का निर्देश दिया और कहा कि यदि किसी भी चरण में अवैधता पाई जाती है तो पूरी प्रक्रिया को रद्द किया जा सकता है. अपील के लिए मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था भी की गई.
पत्र के अनुसार, 27 मई 2026 को Supreme Court ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा और गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़े.
पूर्व अधिकारियों ने कहा कि गलतियों को सुधारा जाना चाहिए, लेकिन एसआईआर की वैधता को लेकर अदालत के फैसले का सम्मान करना संवैधानिक लोकतंत्र का हिस्सा है.
पत्र के अंत में नागरिकों से अपनी और अपने परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों तथा प्रवासी श्रमिकों की मतदाता सूची में प्रविष्टियों की जांच करने की अपील की गई. इसमें कहा गया कि यदि किसी का नाम सूची में नहीं है, तो उसे दावा दाखिल करने में मदद करनी चाहिए.
पत्र में बूथ लेवल अधिकारियों, जिनमें अक्सर शिक्षक और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शामिल होते हैं, के घर-घर जाकर किए जाने वाले काम का भी उल्लेख किया गया. पूर्व अधिकारियों ने कहा कि व्यापक आरोप इन कर्मचारियों के ईमानदार काम को गलत तरीके से धोखाधड़ी बताने के समान हैं.
पत्र में कहा गया, “सवाल करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन आरोप लगाने वाले की जिम्मेदारी है कि वह सबूत पेश करे.” इसमें यह भी कहा गया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोप, जिन्हें शपथ के तहत प्रस्तुत नहीं किया जाता, उनकी न्यायिक जांच और जवाबदेही की प्रक्रिया से तुलना नहीं की जा सकती.
पत्र के समापन में कहा गया कि लोकतंत्र को ऐसे Political विमर्श से नुकसान पहुंचता है, जो पर्याप्त प्रमाण के बिना लोगों के बीच अस्थिरता पैदा करता है और यह धारणा फैलाता है कि उनके वोट की गिनती नहीं हुई या उनके वोट का कोई महत्व नहीं है. इसमें ऐसे Political आख्यानों को चुनावी व्यवस्था के जरिए जनता द्वारा खारिज किए जाने के बाद प्रासंगिकता तलाशने की कोशिश भी बताया गया.
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डीएससी
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