म्यांमार की जेल में 97 दिन बंद रहने के बाद रिहा हुआ पूर्व अमेरिकी मरीन अधिकारी, ट्रंप को दिया श्रेय

वाशिंगटन, 14 अक्टूबर . म्यांमार में 97 दिन तक हिरासत में रहे पूर्व यूएस मरीन एडम कैस्टिलो ने अपनी रिहाई का श्रेय अमेरिकी President डोनाल्ड ट्रंप को दिया है. दावा किया कि इस मामले में अगर ट्रंप ने हस्तक्षेप न किया होता तो वो जीवित नहीं होते. उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्रालय पर मदद न करने और रिहाई की कोशिशों में बाधा डालने का भी आरोप लगाया.

से कैस्टिलो ने बताया कि उन्हें म्यांमार में गिरफ्तार किए जाने के बाद शुरुआती 14 दिन हिरासत में रखा गया और फिर देश की कुख्यात इनसेइन जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने अगले 83 दिन बिताए. इस तरह उनके हिरासत की कुल अवधि 97 दिन रही. उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी अपराध में सजा नहीं सुनाई गई थी, बल्कि हिरासत में रखा गया था.

उनके मुताबिक, गिरफ्तारी की वजह उनके पूर्व संगठन अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स, म्यांमार के भीतर चल रहा एक विवाद था. वो बोले कि संगठन का आंतरिक विवाद Police तक पहुंच गया और बाद में एक अंतरराष्ट्रीय मामला बन गया. इसके बाद उन्हें रिहा कराने के लिए President ट्रंप और व्हाइट हाउस को हस्तक्षेप करना पड़ा.

पूर्व अमेरिकी मरीन ने अपनी रिहाई में ट्रंप की भूमिका को निर्णायक बताते हुए कहा, “मैं अपनी जिंदगी के लिए President का ऋणी हूं. अमेरिकी उपPresident जेडी वेंस और उनके कार्यालय, फेथ काउंसिल, पॉला व्हाइट, कार्डिनल डोलन तथा ग्लोबल रीच से जुड़े मिकी और कैरेन समेत कई लोगों का भी आभार व्यक्त करता हूं. रिहाई के प्रयास में कई लोगों और संगठनों ने मिलकर काम किया, लेकिन अंतिम आदेश President ट्रंप ने दिया.”

वहीं, अपनी रिहाई में अमेरिकी विदेश मंत्रालय की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर कैस्टिलो ने विभाग पर बेहद गंभीर आरोप लगाए. कहा, “विदेश मंत्रालय ने उसकी मदद के लिए कुछ नहीं किया. अमेरिकी दूतावास और वहां के मिशन प्रमुख ने भी सहायता नहीं की. यहां मैं कहना चाहूंगा कि मदद करने में असफल रहने और मदद करने की इच्छा ही नहीं रखने के बीच अंतर है. मेरी रिहाई के लिए प्रयास कर रहे कई लोगों ने विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर काम करने की कोशिश की, लेकिन विभाग ने उनकी कोशिशों में बाधा डाली. अमेरिकी विदेश मंत्रालय को अपने रवैये पर शर्म आनी चाहिए.”

म्यांमार की सबसे कुख्यात जेलों में गिनी जाने वाली इनसेइन जेल में बिताए समय के बारे में उन्होंने कहा, ” वहां की मौजूदा परिस्थितियां लोगों की पारंपरिक धारणा से अलग हैं. म्यांमार की अलग-अलग Governmentों, जेल प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति (आईसीआरसी) ने वर्षों से जेल में रहने की स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए काम किया है.”

कैस्टिलो के अनुसार, प्रत्येक सेल में शौचालय मौजूद था. उन्होंने जेल प्रशासन और आईसीआरसी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इन सुधारों को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया जाता.

उन्होंने आगे कहा, “जेल में मैंने अपने आसपास किसी तरह की मारपीट, दुर्व्यवहार या यातना की घटना नहीं देखी. हालांकि, यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और इससे जेल में बंद अन्य कैदियों की परिस्थितियों के बारे में कोई व्यापक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.”

म्यांमार में सैन्य शासन और लोकतंत्र समर्थक प्रतिरोध के बारे में पूछे जाने पर कहा कि म्यांमार की जनता लंबे समय से युद्ध, प्रतिबंधों और आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रही है. यांगून जैसे बड़े शहरों में लोग अब अपने जीवन को सामान्य बनाने और परिवार के लिए भोजन जुटाने जैसी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देना चाहते हैं.

कैस्टिलो ने बताया कि वह करीब 13 साल तक म्यांमार में रहे और इस दौरान उन्होंने लोगों के बीच युद्ध से उपजी थकान महसूस की. उनके अनुसार, लोकतंत्र समर्थक सशस्त्र प्रतिरोध बेहद बिखरा हुआ और विकेंद्रीकृत है. जातीय सशस्त्र समूहों के भी अपने-अपने लक्ष्य हैं और कोई ऐसा साझा नेतृत्व या कारक नहीं है जो सभी को एकजुट कर सके.

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केआर/