
New Delhi, 26 सितंबर . आध्यात्मिक गुरु और मानवतावादी नेता माता अमृतानंदमयी देवी को दुनिया भर में ‘अम्मा’ के नाम से जाना जाता है. 27 सितंबर 1953 को केरल में जन्मी प्रेम और करुणा की प्रतिमूर्ति माता अमृतानंदमयी ने अपने आलिंगन से लाखों लोगों को शांति का संदेश दिया है, इसलिए उन्हें ‘हगिंग संत’ भी कहा जाता है. मछुआरा परिवार में जन्मी सुधामणि इदमन्नेल से ‘अम्मा’ बनने तक का उनका सफर त्याग और सेवा का प्रतीक है. उनके द्वारा स्थापित माता अमृतानंदमयी मठ आज शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्र में विश्वभर में सेवा कार्य कर रहा है.
माता अमृतानंदमयी देवी का जन्म केरल के छोटे से गांव अलप्पढ़ में हुआ था. जब वे नौ वर्ष की थीं, तब उनकी माताजी बीमार पड़ गईं और माता अमृतानानंदमयी को घर के कामों और अपने सात भाई-बहनों की देखभाल में मदद करने के लिए स्कूल से निकाल लिया गया. जब वे अपने परिवार की गायों के लिए पड़ोसियों से बचा हुआ अनाज इकट्ठा करने के लिए घर-घर जाती थीं, तो उन्हें अपने समुदाय और उससे परे की दुनिया में व्याप्त घोर गरीबी और पीड़ा का सामना करना पड़ा.
जहां भी माता अमृतानानंदमयी जरूरतमंद लोगों से मिलती थीं, वे उन्हें अपने घर से भोजन और वस्त्र देती थीं. ऐसा करने पर परिवार से मिलने वाली डांट और सजा से वे विचलित नहीं हुईं. वे लोगों को उनके दुख में सांत्वना देने के लिए सहज रूप से गले लगाने लगीं. उनके स्नेहपूर्ण देखभाल के फलस्वरूप, लोग उन्हें अम्मा (मां) कहने लगे.
जबकि उस समय एक 14 वर्ष की कन्या को पुरुष समेत किसी को भी स्पर्श करने की आज्ञा नहीं दी जाती थी. अपने माता-पिता से विपरीत प्रतिक्रियाएं मिलने के बावजूद भी अम्मा ऐसा ही करती रहीं. अम्मा का कहना है, “मै यह नहीं देखती कि वह एक स्त्री है या पुरुष. मैं किसी को भी स्वयं से भिन्न रूप में नहीं देखती. मुझसे संसार की सभी रचनाओं की ओर एक निरंतर प्रेम धारा बहती है. यह मेरा जन्मजात स्वभाव है. एक चिकित्सक का कर्तव्य रोगियों का उपचार करना होता है. इसी प्रकार मेरा कर्तव्य उन लोगों को सांत्वना देना है जो कष्ट में हैं.
माता-पिता द्वारा विवाह के अनेकों प्रयासों के बावजूद भी अम्मा ने विवाह नहीं किया. 1981 में जब अनेकों जिज्ञासु पर्यकडवु में आकर अम्मा के शिष्य बनने के लिए उनके माता-पिता की संपत्ति में रहने लगे तो एक विश्वस्तरीय संगठन, माता अमृतानंदमयी मठ की स्थापना की गई. आज माता अमृतानंदमयी मठ अनेकों आध्यात्मिक और धर्मार्थ गतिविधियों में संलग्न है. 1987 में अपने श्रद्धालुओं के अनुरोध पर अम्मा विश्व के सभी देशों में कार्यक्रम आयोजित करती हैं.
अम्मा का दर्शन अपने आप में अनूठा है. अम्मा सभी दर्शनार्थियों को गले लगाती हैं, अपने कंधे पर सिर रखकर उन्हें आश्वासन देती हैं. चाहे भीड़ हजारों की हो या लाखों की, अम्मा सभी को दर्शन देने के बाद ही पीठम से उठती हैं.
अम्मा के विश्वव्यापी धर्मार्थ मिशन में बेघर लोगों के लिए 100,000 घर, 3 अनाथ आश्रम और 2004 में भारतीय सागर में सुनामी जैसी आपदाओं से सामना होने की अवस्था में राहत-और-पुनर्वास, मुफ्त चिकित्सकीय देखभाल, विधवाओं और असमर्थ व्यक्तियों के लिए पेंशन, पर्यावरणीय सुरक्षा समूह, मलिन बस्तियों का नवीनीकरण, वृद्धों के लिए देखभाल केंद्र और गरीबों के लिए मुफ्त वस्त्र और भोजन आदि कार्यक्रम सम्मिलित हैं.
अम्मा अपने भक्ति संगीत के लिए भी प्रसिद्ध हैं. उनके द्वारा गाये गए भजनों की 100 से अधिक रिकॉर्डिंग, 20 से भी अधिक भाषाओं में उपलब्ध हैं. उन्होंने कई भजनों की रचना की है. अम्मा के शिष्यों ने भक्तों और आध्यात्मिक अन्वेषणकर्ताओं के साथ उनके संवादों को लिपिबद्ध करके उनकी शिक्षाओं की लगभग एक दर्जन पुस्तकों का प्रकाशन किया है.
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ओपी/
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