
New Delhi, 17 सितंबर . Supreme Court ने Thursday को इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) को एक महिला को 12 लाख रुपए का मुआवजा देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि महिला होने के कारण उसके साथ भेदभाव करना ‘नारीत्व का अपमान’ था.
जस्टिस अरविंद कुमार और विपुल एम. पंचोली की बेंच ने एक महिला के उस दावे पर विचार करते हुए यह निर्देश दिया, जिसमें उसने पब्लिक सेक्टर की तेल कंपनी में नौकरी न मिलने पर सवाल उठाया था.
सुनवाई के दौरान Supreme Court ने आईओसीएल के उस रुख पर सवाल उठाया कि महिला नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं थी, क्योंकि इस काम में शारीरिक मेहनत, एलपीजी सिलेंडर उठाना और नाइट शिफ्ट में काम करना शामिल था.
जस्टिस अरविंद कुमार की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, “आपने सिर्फ इसलिए उसे नौकरी नहीं दी, क्योंकि वह एक महिला है? यह नारीत्व का अपमान है.”
यह देखते हुए कि महिला रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी है, Supreme Court ने उसे नौकरी देने का आदेश देने के बजाय उसके साथ हुए भेदभाव के लिए एकमुश्त मुआवजा देना उचित समझा.
Supreme Court ने कहा, “वह अब रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी है, लेकिन उसने लगातार अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी है. हम उसे एकमुश्त मुआवजा देंगे.”
कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाएं रोजाना अपने घरों में एलपीजी सिलेंडर संभालती हैं और इस काम को महिलाओं के लिए अनुपयुक्त मानने के तर्क पर सवाल उठाया.
बेंच ने कहा, “हम India से हैं और हर दिन हम कहते हैं कि हम महिलाओं का सम्मान करते हैं और वे देवी के समान हैं. यह नारीत्व का अपमान है और वह भी India Government के एक उपक्रम द्वारा. वे (महिलाएं) रोजाना अपने घरों में गैस सिलेंडर उठाती हैं. जब पुरुष घर पर नहीं होते, तो वही गैस सिलेंडर बदलती हैं.”
सुनवाई के दौरान, आईओसीएल के वकील ने कहा कि अधिकारियों ने शायद महिला को अनुपयुक्त पाया होगा, क्योंकि नौकरी में शारीरिक मेहनत जैसे एलपीजी सिलेंडर उठाना और नाइट शिफ्ट में काम करना शामिल था. यह तर्क भी दिया गया कि उम्मीदवारों के नामों वाली सूची केवल एक सिफारिश थी और उसे मानने के लिए कोई बाध्यता नहीं थी.
यह विवाद गुढ़ा में आईओसीएल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए महिला के दावे से जुड़ा है. पिछली कार्यवाही के अनुसार, डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली एक समिति ने नौकरी के लिए 49 उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश की थी, जिसमें वह महिला भी शामिल थी. महिला कैजुअल खलासी/प्यून के पद के लिए इंटरव्यू में शामिल हुई थी, लेकिन उसे रिजेक्ट कर दिया गया.
पंजाब और Haryana हाईकोर्ट के आदेश में उसके इस तर्क का जिक्र है कि इंटरव्यू के बाद 43 उम्मीदवारों को चुना गया था, जबकि उसे सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि वह एक महिला थी. इसके बाद वह ट्रायल कोर्ट गईं, जिसने उनके केस के पक्ष में फैसला सुनाया और आईओसीएल को निर्देश दिया कि वह उन्हें कैजुअल कर्मचारी के तौर पर या लेबरर के अलावा किसी एडमिनिस्ट्रेटिव पोस्ट/प्यून पोस्ट पर रखे. पब्लिक सेक्टर की ऑयल कंपनी ने इस फैसले को पहली अपीलेट कोर्ट में चुनौती दी, जिसने 22 सितंबर 1990 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और 6 अगस्त 1993 को महिला का केस खारिज कर दिया.
इसके बाद मामला पंजाब और Haryana हाई कोर्ट पहुंचा, जिसने 14 अक्टूबर 2025 को दिए अपने फैसले में पहली अपीलेट कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और महिला की अपील खारिज कर दी. जस्टिस विकास बहल की सिंगल-जज बेंच ने कहा कि जिन नियुक्तियों की बात हो रही है, वे डेली-वेज आधार पर कैजुअल खलासी/प्यून पोस्ट के लिए थीं और मंजूर की गई पोस्ट के खिलाफ नहीं थीं. कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला प्रशासन की सिफारिश किसी ऐसे कानूनी प्रावधान, नियम या रेगुलेशन पर आधारित नहीं थी, जिससे आईओसीएल के लिए सिफारिश किए गए उम्मीदवारों को नियुक्त करना जरूरी हो जाता.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला को आईओसीएल में न तो चुना गया था और न ही उसने वहां काम किया था और सिर्फ सिफारिश के आधार पर नियुक्ति का उसका कोई पक्का अधिकार नहीं बनता था.
Supreme Court के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार का नाम सेलेक्ट लिस्ट या पैनल में शामिल होने से ही उसे नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिल जाता. हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कोई लिखित आदेश नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि महिला की उम्मीदवारी सिर्फ इसलिए खारिज की गई थी, क्योंकि वह महिला थी.
कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति के कानूनी अधिकार के अभाव में कथित तौर पर जेंडर के आधार पर खारिज किए जाने को ही उसकी नियुक्ति का आदेश देने का आधार नहीं बनाया जा सकता. हाई कोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला ने जिस डॉक्यूमेंट का हवाला दिया था, वह खास तौर पर ‘जमीन गंवाने वालों’ से संबंधित था, जबकि वह इस कैटेगरी में नहीं आती थी. कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि उसके सामने ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि आईओसीएल के लिए किसी नियम, रेगुलेशन या पॉलिसी के तहत गांव के निवासियों या जमीन गंवाने वालों को नियुक्त करना जरूरी था.
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डीके/डीकेपी
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