
New Delhi, 27 अगस्त . देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों की कहानियां हमेशा आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती हैं. कारगिल युद्ध के ऐसे ही एक वीर योद्धा थे कैप्टन अनुज नैय्यर, जिन्हें उनकी अदम्य बहादुरी के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. महज 24 वर्ष की उम्र में शहीद हुए कैप्टन नैय्यर ने दुश्मन के खिलाफ ऐसा पराक्रम दिखाया, जिसे भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा. उनकी जयंती 28 अगस्त को मनाई जाती है.
कैप्टन अनुज नैय्यर का जन्म 28 अगस्त 1975 को दिल्ली में हुआ था. उनके पिता एसके नैय्यर प्रोफेसर थे जबकि उनकी मां मीना नैय्यर दिल्ली विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में कार्यरत थीं. अनुज को बचपन से ही सेना और हथियारों में गहरी दिलचस्पी थी. उनके दादा भी सेना में थे और अनुज का उनसे विशेष लगाव था. परिवार के मुताबिक, बचपन से ही उनमें असाधारण साहस दिखाई देता था.
उनके साहस का एक उदाहरण बचपन की एक घटना से मिलता है. एक हादसे में अनुज गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इलाज के दौरान उन्होंने बिना एनेस्थीसिया के 22 टांके लगवा लिए. इतनी कम उम्र में उनकी हिम्मत देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए थे. शायद यही जज्बा आगे चलकर उन्हें युद्ध के मैदान में अदम्य साहस दिखाने की ताकत देने वाला था.
अनुज ने 12वीं कक्षा के बाद पहले ही प्रयास में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के लिए चयन हासिल कर लिया. वर्ष 1993 में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई और 1996 में वे एनडीए से पास आउट हुए. इसके बाद उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में प्रशिक्षण लिया और 7 जून 1997 को सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में पास आउट हुए. उन्हें 17वीं जाट रेजिमेंट में कमीशन मिला.
सेना में शामिल होने के महज दो साल बाद ही देश कारगिल युद्ध की आग में घिर गया. अनुज नैय्यर को भी युद्ध क्षेत्र में भेजा गया. वह कुछ समय पहले ही लेफ्टिनेंट से कैप्टन के पद पर पदोन्नत हुए थे और 17 जाट रेजिमेंट की चार्ली कंपनी का हिस्सा थे.
कारगिल युद्ध के दौरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पॉइंट 4875 पर Pakistanी घुसपैठियों का कब्जा था. इस चोटी को दुश्मन से मुक्त कराने की जिम्मेदारी 17 जाट की चार्ली कंपनी को दी गई. 6 जुलाई 1999 को कंपनी ने अभियान शुरू किया लेकिन शुरुआती कार्रवाई में ही कंपनी कमांडर घायल हो गए. इसके बाद अभियान की कमान कैप्टन अनुज नैय्यर ने संभाली.
कैप्टन नैय्यर ने अपने साथियों के साथ बेहद कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ना शुरू किया. दुश्मन को जैसे ही भारतीय सैनिकों की मौजूदगी का अंदाजा हुआ, उसने भारी गोलीबारी शुरू कर दी लेकिन कैप्टन नैय्यर पीछे नहीं हटे. उन्होंने अपने साथियों का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के ठिकानों पर जबरदस्त हमला किया.
युद्ध के दौरान कैप्टन अनुज नैय्यर ने असाधारण साहस का परिचय देते हुए नौ Pakistanी घुसपैठियों को मार गिराया. उनकी कार्रवाई से भारतीय सैनिकों को आगे बढ़ने का रास्ता मिला और दुश्मन को पीछे हटना पड़ा. पिंपल-2 क्षेत्र में 17 जाट के जवानों ने लगभग जीत हासिल कर ली थी.
कैप्टन नैय्यर खुद भी घायल हो चुके थे लेकिन उन्होंने लड़ाई जारी रखी. उन्होंने मशीनगन से दुश्मन के एक बंकर को तबाह किया. विजय करीब थी और तिरंगा फहराने की तैयारी थी. इसी दौरान दुश्मन का एक ग्रेनेड उनके पास आ गिरा. 7 जुलाई 1999 को कैप्टन अनुज नैय्यर ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया.
कैप्टन नैय्यर की शहादत से जुड़ी एक घटना उनकी निजी जिंदगी और उनके फौजी जज्बे दोनों को सामने लाती है. बताया जाता है कि युद्ध के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को एक अंगूठी दी थी. उन्होंने कहा था कि इसे उनकी होने वाली मंगेतर तक पहुंचा दिया जाए.
जब वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वे खुद लौटकर अंगूठी दें, तो अनुज ने जवाब दिया कि युद्ध में जाने वाला सैनिक यह नहीं जानता कि वह वापस आएगा या नहीं. अगर वे लौटे तो अंगूठी खुद देंगे लेकिन अगर नहीं लौटे तो इसे उनके घर पहुंचा दिया जाए. दुर्भाग्य से वे वापस नहीं लौट सके. जब उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा दिल्ली पहुंचा, तो परिवार के साथ एक युवती भी बिलख रही थी. वह सिमरन थीं, जिनसे अनुज की सगाई होने वाली थी.
कैप्टन अनुज नैय्यर को कारगिल युद्ध में उनके अद्वितीय साहस, नेतृत्व और बलिदान के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनका जीवन बताता है कि देशभक्ति केवल शब्द नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प है. 24 वर्ष की छोटी-सी उम्र में शहीद हुए कैप्टन अनुज नैय्यर आज भी देश के युवाओं के लिए साहस, कर्तव्य और बलिदान की मिसाल हैं.
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पीएम
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