महाराष्ट्र के सांगोला गांव में दशहरा मनाने की अनोखी परंपरा, रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा करते हैं लोग

अकोला, 19 अक्टूबर . India के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी और रावण दहन को लेकर कई अनोखी परंपराएं और प्रथाएं प्रचलित हैं. कई जगहों पर रावण दहन की परंपरा नहीं होती, बल्कि इसके बजाय रावण की पूजा की जाती है. इन स्थानों में Maharashtra के अकोला जिले का सांगोला गांव भी शामिल है.

अकोला से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित गांव में एक ही पत्थर से बनी रावण की मूर्ति है, जिसमें उसे दस सिरों वाले राजा के रूप में और हथियारों के साथ दिखाया गया है. इस गांव में दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं, बल्कि उसकी पूजा की जाती है. गांव में रावण की पूजा करने के पीछे ग्रामीणों का मानना है कि रावण में जहां कुछ दुर्गुण थे, वहीं उसमें कई सद्गुण भी मौजूद थे. इसलिए रावण को सिर्फ घृणा की दृष्टि से देखने के बजाय, उसके दुर्गुणों को छोड़कर उसके अच्छे गुणों को अपनाना चाहिए. रावण के अच्छे गुणों को स्वीकार करते हुए यहां के ग्रामीण परंपरागत रूप से उसकी पूजा करते आ रहे हैं.

इस प्रतिमा को गांव के दूसरी ओर स्थापित किया जाना था, लेकिन प्रतिमा को गांव की सीमा से आगे ले जाना संभव नहीं हुआ. आखिरकार, गांव के प्रवेश द्वार पर ही उसकी स्थापना कर दी गई. आज भी यहां के पुजारी प्रतिदिन इस प्रतिमा की पूजा करते हैं. इसके पीछे ग्रामीणों की गहरी आस्था है.

पुजारी बालकृष्ण जाधव ने समाचार एजेंसी को बताया कि यहां यह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी है. उन्होंने कहा, “हमारे गुरुजी ने बताया था कि रावण की मूर्ति को दूसरी जगह से एक बैलगाड़ी में लाया गया था. जिस वक्त इस मूर्ति को ले जाया जा रहा था तो ये हमारे गांव के इस स्थान से आगे नहीं बढ़ी थी. इसलिए गांव के लोगों ने मूर्ति की यहीं स्थापना की.”

उन्होंने बताया कि Saturday के दिन नारियल के तेल से पूजा की जाती है और धूप-दीप, अगरबत्ती लगाई जाती है.

एक स्थानीय युवक ने कहा, “माना जाता है कि 200 या 300 साल पहले गांव में मूर्ति की स्थापना हुई थी. यहां पर पास में एक चिखल गांव है. वहां पर मूर्ति को बनाया गया था, जब वहां से मूर्ति को दूसरी जगह ले जाया जा रहा था, तब पास से गुजरने वाली नदी से थोड़ी दूर पर मूर्ति आगे नहीं बढ़ पाई थी. गांव वालों ने इसी गांव में मूर्ति की स्थापना कराई और तभी से यहां मूर्ति पूजन किया जाता है.”

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डीसीएच/