
New Delhi, 7 नवंबर . Rajasthan हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने मस्जिदों और अन्य निर्माणों से जुड़े पांच मामलों में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा है कि किसी भी कार्रवाई से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करना और प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर देना जरूरी है. राज्य Government की ओर से अदालत को आश्वासन दिया गया कि कारण बताओ नोटिस पर निर्णय होने तक संबंधित निर्माणों के खिलाफ कोई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं की जाएगी.
यह आदेश 6 नवंबर को जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने गफूर बनाम Rajasthan राज्य एवं अन्य मामले में दिया. प्रभावित पक्षों की ओर से जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर अधिवक्ताओं ने पैरवी की. इनमें एडवोकेट हरीश कुमार पुरोहित और एडवोकेट इकबाल खान शामिल थे. एडवोकेट ताहिर हकीम और लीगल सेल के संयोजक प्रोफेसर निसार अहमद अंसारी ने भी सहयोग किया.
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रशासन कारण बताओ नोटिस का जवाब प्राप्त करने और उस पर विचार करने से पहले ही बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है. प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर भी नहीं दिया जा रहा है.
इस पर अदालत ने अपीलकर्ताओं को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया. साथ ही निर्देश दिया कि जवाब मिलने के बाद सक्षम अधिकारी प्रभावित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर दें. सभी संबंधित दस्तावेजों पर विचार करने के बाद कानून के अनुसार कारण सहित लिखित आदेश पारित किया जाए.
इसी दिन खंडपीठ ने चार अन्य अपीलों का भी निस्तारण किया. अदालत ने कहा कि इन मामलों के तथ्य गफूर बनाम Rajasthan राज्य मामले में दिए गए आदेश के दायरे में आते हैं. इनमें बाड़मेर की मस्जिद आदर्श नगरी, मनोहर मस्जिद , जैसलमेर के भरीवाला निवासी हसन हुसैन और बाड़मेर के मलाना गांव निवासी मुस्तफा खान की अपीलें शामिल हैं.
जमीयत उलमा-ए-Rajasthan के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में मस्जिदों और दरगाहों के खिलाफ कार्रवाई 18 जून 2026 को शुरू हुई थी. इस दौरान 14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त किया गया. आरोप है कि इस कार्रवाई में प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया.
कार्रवाई की जानकारी मिलने के बाद जमीयत उलमा-ए-Rajasthan के महासचिव मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री ने प्रभावित लोगों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की घोषणा की. इसके बाद Rajasthan हाईकोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन्हें 13 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया गया.
इसके बाद जमीयत ने Supreme Court का रुख किया. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने वहां मामलों की पैरवी की, जिसके बाद 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश मिला. Supreme Court के निर्देश के अनुसार बाद में Rajasthan हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपीलें दाखिल की गईं.
बुलडोजर कार्रवाई के दौरान जमीयत उलमा-ए-हिंद का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल उत्तर प्रदेश जमीयत के अध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी के नेतृत्व में Rajasthan पहुंचा था. हालांकि, प्रतिनिधिमंडल को प्रभावित क्षेत्रों में जाने से रोक दिया गया था.
गत 16 अक्टूबर को जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया. इसमें जमीयत उलमा Madhya Pradesh के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून, मौलाना मुफ्ती जाकिर हुसैन कासमी, नाजिम-ए-तंजीम जमीयत उलमा-ए-हिंद (उत्तर) और मौलाना अजीमुल्लाह सिद्दीकी, सचिव जमीयत उलमा-ए-हिंद शामिल थे.
प्रतिनिधिमंडल ने मालासर और मीरपुरा सहित विभिन्न गांवों में ध्वस्त मस्जिदों का जायजा लिया. प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने बताया कि ये मस्जिदें दूरदराज के पहाड़ी इलाकों की छोटी बस्तियों में स्थित थीं. स्थानीय लोगों ने कठिन परिस्थितियों में रेतीली जमीन पर इनका निर्माण कराया था. मस्जिदों की स्थिति देखकर प्रतिनिधिमंडल के सदस्य भावुक हो गए.
हाईकोर्ट के आदेश पर जमीयत उलमा-ए-Rajasthan के जिम्मेदारों ने उम्मीद जताई कि प्रभावित लोगों को न्याय मिलेगा और प्रशासन कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगा. सभी ने क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की. जमीयत ने कहा कि प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने के लिए संगठन की कानूनी और संवैधानिक लड़ाई जारी रहेगी.
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एएमटी/
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