
New Delhi, 4 अक्टूबर . मौजूदा समय में बैडमिंटन India के शीर्ष खेलों में शुमार है. महिला खिलाड़ियों की संख्या भी बैडमिंटन में तेजी से बढ़ी है. साइना नेहवाल और पीवी सिंधु महिला बैडमिंटन में देश में बड़ा नाम रही हैं, लेकिन इन दोनों खिलाड़ियों से पहले एक और खिलाड़ी थीं, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से नेहवाल और सिंधु जैसे खिलाड़ियों के लिए इस खेल में आने का रास्ता आसान बनाया. उस दिग्गज खिलाड़ी का नाम मधुमिता बिष्ट है.
मधुमिता बिष्ट का जन्म 5 अक्टूबर 1964 को जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में हुआ था. काफी कम उम्र से बैडमिंटन में रुचि रखने और इस खेल में बड़ी उपलब्धि हासिल करने का इरादा रखने वाली मधुमिता आठ बार की राष्ट्रीय एकल चैंपियन, नौ बार की युगल विजेता और बारह बार की मिश्रित युगल विजेता हैं. उनकी सफलता बताती है कि राष्ट्रीय स्तर पर बैडमिंटन में उनका कितना दबदबा था.
‘उत्तराखंड की बैडमिंटन क्वीन’ के नाम से मशहूर मधुमिता ने 1992 के ओलंपिक में महिला एकल स्पर्धा में India का प्रतिनिधित्व किया था. मधुमिता ने पहले राउंड में आइसलैंड की एल्सा नीलसन को हराया था, लेकिन दूसरे राउंड में ग्रेट ब्रिटेन की जोआन मुगेरिज से हारकर उनका सफर समाप्त हो गया था.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मधुमिता बिष्ट ने एशियन गेम्स में अपनी क्षमता प्रदर्शित की थी और देश के लिए पदक जीता था. उन्होंने 1982 में एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता. कॉमनवेल्थ गेम्स 1998 में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली भारतीय महिला टीम का वह हिस्सा रही थीं.
मधुमिता ‘वर्ल्ड कप’ और ‘उबेर कप’ में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. उन्होंने 2000 में खेल को अलविदा कहा था. संन्यास के बाद वह भारतीय खेल प्राधिकरण की बैडमिंटन अकादमी के लिए भी कार्य कर चुकी हैं.
बैडमिंटन के क्षेत्र में मधुमिता के योगदान को देखते हुए India Government ने उन्हें 1982 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ और 2006 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया था.
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पीएके
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