मणिपुर चक्र को जागृत करती है रुद्र मुद्रा, जानें करने का सही तरीका

New Delhi, 22 अक्टूबर . योग और आयुर्वेद में मुद्राओं का विशेष महत्व बताया गया है. हाथों की उंगलियों से बनने वाली ये मुद्राएं शरीर में मौजूद पांच तत्वों को संतुलित करने का काम करती हैं. ऐसी ही एक शक्तिशाली और प्रभावशाली मुद्रा है, रुद्रा मुद्रा. मान्यता है कि इसके नियमित अभ्यास से न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ता है.

रुद्र मुद्रा योग विज्ञान की एक अत्यंत शक्तिशाली हस्त मुद्रा है, जो शरीर में ऊर्जा, मानसिक स्पष्टता और शारीरिक शक्ति को बढ़ाने के लिए जानी जाती है. आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह मुद्रा शरीर के मणिपुर चक्र (मानव शरीर के सात मुख्य चक्रों में तीसरा चक्र) को सक्रिय करती है, जो हमारे शरीर में अग्नि और जीवन शक्ति का केंद्र है.

रुद्र मुद्रा को आयुर्वेद में पाचन की अग्नि को ठीक करने वाली मुद्रा कहा गया है. इसके अभ्यास से पेट से जुड़ी एसिडिटी, पेट फूलना (गैस) और कब्ज जैसी समस्याओं में काफी राहत मिलती है.

भगवान शिव के एक रूप रुद्र के नाम पर रखी गई इस मुद्रा को अग्नि तत्व की मुद्रा भी कहा जाता है. इस मुद्रा को बनाने के लिए हाथ की तर्जनी (इंडैक्स फिंगर) और अनामिका (रिंग फिंगर) के सिरों को अंगूठे के सिरों से मिलाया जाता है जबकि बीच की और छोटी उंगली सीधी रखी जाती है.

योग विशेषज्ञों के अनुसार, रुद्र मुद्रा उन लोगों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है, जो निम्न रक्तचाप की समस्या से जूझ रहे हैं क्योंकि यह रक्त परिसंचरण में सुधार करती है. दरअसल, हमारा ब्लड प्रेशर सीधे तौर पर रक्त परिसंचरण और अग्नि तत्व से जुड़ा होता है. जब शरीर में अग्नि तत्व कमजोर हो जाता है, तो दिल को पूरे शरीर तक खून पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और खून की गति धीमी पड़ जाती है, जिसे हम लो बीपी कहते हैं. अंगूठे से मिलने वाली अग्नि की गर्मी से खून की नलियों में सिकुड़न कम होती है और खून का बहाव तेज होता है.

रुद्र मुद्रा एक पूरक प्राकृतिक चिकित्सा है. इसे गंभीर चिकित्सीय स्थितियों में आधुनिक दवाओं के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

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एनएस/पीएम