
न्यूयॉर्क, 27 अक्टूबर . India ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में वीटो को लेकर अपना मत स्पष्ट किया है. भारतीय प्रतिनिधि ने ‘डी फैक्टो वीटो’ की आलोचना करते हुए कहा कि वीटो अधिकार का नहीं बल्कि जिम्मेदारी का एहसास कराता है.
Monday को महासभा में पांच स्थायी सदस्यों (पी5) के वीटो अधिकारों पर हुई बहस के दौरान, संयुक्त राष्ट्र में India के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने बताया कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए ‘इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स’ (आईजीएन) के तहत यह एक अहम मुद्दा था, लेकिन कुछ देशों ने ‘अप्रत्यक्ष वीटो’ का इस्तेमाल किया जिससे ये प्रक्रिया अटक गई है.
उन्होंने कहा, “आईजीएन प्रक्रिया में भी ‘आम सहमति’ की दलील का इस्तेमाल एक डी फैक्टो वीटो (छिपे हुए) के रूप में किया जा रहा है.”
India के अनुसार, वीटो पावर का विशेषाधिकार किसी संकीर्ण Political स्वार्थ को साधने का साधन नहीं बनना चाहिए.
‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ नाम के देशों के एक छोटे समूह ने प्रक्रिया संबंधी पैंतरों का इस्तेमाल करके आईजीएन को बातचीत के लिए कोई मसौदा अपनाने से रोक दिया है.
इस समूह का नेतृत्व इटली कर रहा है और इसमें Pakistan भी शामिल है.
हरीश ने कहा कि 2008 का महासभा प्रस्ताव, जो “आईजीएन के लिए आधारभूत निर्णय है, बिल्कुल स्पष्ट है: इसका मुख्य सिद्धांत ‘अधिकतम Political स्वीकृति’ है, न कि ‘आम सहमति’.”
उन्होंने बताया कि बातचीत के 17 दौर पूरे होने के बाद भी, “हमारे पास दिखाने के लिए कोई नतीजा नहीं है.” इसका कारण वह ‘व्यावहारिक वीटो’ है, जिसका आईजीएन को बनाने वाले प्रस्ताव में कोई आधार नहीं है.
उन्होंने कहा कि व्यापक सुधारों की शुरुआत के लिए “स्पष्ट समय-सीमा और लक्ष्यों के साथ, मसौदे पर आधारित बातचीत को जल्द शुरू करना” जरूरी है.
इसके अलावा कुछ ऐसे गुप्त वीटो भी हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र चार्टर में मान्यता नहीं मिली है, फिर भी कुछ अहम मामलों में गैर-स्थायी सदस्यों को भी इनका इस्तेमाल करने दिया जाता है.
इस ओर इशारा करते हुए हरीश ने कहा, “वीटो सिर्फ वह नहीं है जिसका इस्तेमाल खुले तौर पर किया जाता है. इसके अलावा एक डी फैक्टो वीटो भी होता है, जो सुरक्षा परिषद के हर सदस्य—चाहे वह चुना गया हो या नहीं—के पास होता है. इसका इस्तेमाल वे अध्यक्षीय बयानों, प्रेस बयानों और प्रतिबंध समितियों के फैसलों पर कर सकते हैं.”
ऐसा इसलिए है क्योंकि “आम सहमति के ‘अलिखित नियम’ के तहत, कोई भी एक सदस्य किसी प्रस्ताव को रोक सकता है, और अक्सर इसके लिए उसे कोई कारण भी नहीं बताना पड़ता.” चीन ने कई बार प्रतिबंध समिति की गुप्त बैठकों में Pakistan स्थित आतंकवादियों – जैसे लश्कर-ए-तैयबा के जकी-उर-रहमान लखवी और शाहिद महमूद, तथा जैश-ए-मोहम्मद के साजिद मीर और मसूद अजहर – पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को रोका है.
हरीश ने व्यापक सुधारों की वकालत करते हुए कहा, “सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता से जुड़े सवालों का जवाब सिर्फ वीटो को मैनेज करने से नहीं मिलेगा. इन सुधारों में परिषद का विस्तार करना और नए स्थायी सदस्य शामिल करना भी शामिल होना चाहिए.”
उन्होंने कहा, “इन सवालों का जवाब एक ऐसी परिषद से मिलेगा जो अपने उद्देश्य के लिए पूरी तरह उपयुक्त हो, जिसकी संरचना आज की वास्तविकताओं को दर्शाती हो, न कि आठ दशक पहले हुए युद्ध के नतीजों को.”
हरीश ने बताया कि India ने एक “सिद्धांत-आधारित रुख” अपनाया है, जिसके अनुसार सुधारों के जरिए स्थायी सदस्य के रूप में शामिल होने वाले किसी भी देश के पास वीटो का अधिकार भी होना चाहिए.
उन्होंने कहा, “हम फिर दोहराते हैं कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक एक सुधारी गई परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए.”
उन्होंने कहा कि “निष्पक्षता और न्याय की यही मांग है.”
हरीश ने सुरक्षा परिषद के सदस्यों की नई “दूसरे दर्जे” (सेकंड क्लास) की श्रेणियां बनाने के विचार को भी खारिज कर दिया – जैसे कि लंबे कार्यकाल वाले सदस्य या बिना वीटो अधिकार वाले स्थायी सदस्य. उन्होंने कहा कि “इससे सुधारों पर चल रही पहले से ही कठिन चर्चा और अधिक जटिल हो जाएगी, और यह उस असमानता को और गहरा कर देगा जिसे हम दूर करना चाहते हैं.”
हरीश इस विचार को लेकर भी संशय में थे कि सुरक्षा परिषद में वीटो का इस्तेमाल करने वाले देशों को महासभा के सामने आकर अपने कदम के बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए.
उन्होंने कहा कि इसका मकसद “बदलाव लाना” और जवाबदेही तय करना था, लेकिन जब से यह व्यवस्था लागू हुई है, तब से वीटो के इतने अधिक इस्तेमाल ने “बिल्कुल उलट कहानी बयां की है.”
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केआर/
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