
हनोई, 13 सितंबर . ब्रिक्स प्लस में India की भूमिका केवल New Delhi शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस विस्तारित समूह ने India को ग्लोबल साउथ के देशों के साथ जुड़ने के लिए एक बड़ा मंच दिया है. हालांकि, इससे गठबंधन को साधने की चुनौती भी बढ़ गई है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि India को अब यूएई समेत अन्य मध्यम ताकतवर देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना होगा और नए सदस्यों के साथ तालमेल बैठाना होगा, ताकि लगातार हो रहे विस्तार से समूह की ताकत कमजोर न पड़े.
वियतनाम टाइम्स की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, “ब्रिक्स अब वो छोटा पांच देशों का समूह नहीं रहा, जिसे India ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच के तौर पर बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. विस्तार के बाद इसका भौगोलिक दायरा, जनसंख्या और आर्थिक वजन काफी बढ़ गया है और यह मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से असंतुष्ट देशों की आवाज के तौर पर उभरा है, लेकिन इस विस्तार ने ऐसे समूह में और भी अंतर्विरोध ला दिए हैं, जो पहले से ही बहुत एकजुट नहीं था.”
हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी माना कि विस्तार India के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. मूल ब्रिक्स ने New Delhi को एक अलग पहचान दी थी, वहीं विस्तारित ब्रिक्स अब India को मध्य पूर्व, अफ्रीका, एशिया और पूरे ग्लोबल साउथ के अहम देशों के साथ रिश्ते गहरे करने का एक व्यापक मंच दे रहा है.
रिपोर्ट में जिक्र किया गया है, “ब्रिक्स प्लस India की पसंदीदा शब्दावली को और अधिक मजबूती दे सकता है: रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीयता, संप्रभु समानता, सुधरा हुआ बहुपक्षवाद और विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व. यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है. India को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने के लिए ब्रिक्स की आवश्यकता नहीं है. India को उस व्यवस्था के भीतर अपनी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाने के लिए ब्रिक्स की आवश्यकता है.”
रिपोर्ट में आगे कहा गया, “विस्तारित समूह अंतरराष्ट्रीय संगठनों और अन्य संस्थानों में सुधार के लिए India के तर्क को मजबूत करता है, जिनकी संरचनाएं आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती हैं. यह विकास वित्तपोषण, जलवायु न्याय, प्रौद्योगिकी पहुंच, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर India की ग्लोबल साउथ कूटनीति के लिए एक मंच भी प्रदान करता है.”
रिपोर्ट के अनुसार, New Delhi को ब्रिक्स प्लस को न तो अपने विदेश नीति के प्राथमिक मंच के रूप में देखना चाहिए और न ही एक असुविधाजनक विरासत वाले समूह के रूप में. इसके बजाय, इसे गुट की राजनीति को अपनाए बिना बहुध्रुवीयता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति के एक स्तंभ के रूप में देखना चाहिए, जहां दिल्ली की अध्यक्षता India के राजनयिक नेतृत्व को प्रदर्शित कर सकती है, वहीं इसके बाद जो होगा वह उसकी कूटनीति की परीक्षा को दर्शाएगा.
रिपोर्ट में कहा गया, “केंद्रीय बिंदु यह नहीं है कि क्या ब्रिक्स प्लस पुराने ब्रिक्स से अधिक मजबूत है. केंद्रीय बिंदु यह है कि क्या India एक बड़े और अधिक विरोधाभासी समूह को एक बहुध्रुवीय व्यवस्था के पक्ष में काम करवा सकता है जो भारतीय स्वायत्तता को बनाए रखे.”
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डीकेपी
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