बिहार : तेलडीहा मंदिर में पाठा बलि की परंपरा, मिट्टी के गर्भगृह में विराजती हैं मां, विकास की दरकार

बांका, 18 अक्टूबर . बिहार के बांका जिले में बदुआ नदी के किनारे स्थित प्रसिद्ध तेलडीहा दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र की महाष्टमी पर Sunday को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी. मां दुर्गा के दर्शन, पूजा-अर्चना और मनोकामनाओं की पूर्ति की आस लेकर बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा Jharkhand, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल से भी श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं.

तांत्रिक सिद्धि पीठ के रूप में चर्चित इस मंदिर में नवरात्र के दौरान आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि मंदिर परिसर से लेकर आसपास के रास्तों तक चहल-पहल बढ़ जाती है. पाठा बलि और डलिया चढ़ाने की परंपरा भी यहां की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. बांका जिले के शंभूगंज प्रखंड के तेलडीहा गांव स्थित यह मंदिर बांका और मुंगेर जिले की सीमा के निकट है. मुंगेर के तारापुर और बांका के शंभूगंज से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है. मंदिर की स्थापना की परंपरा वर्ष 1603 से जुड़ी है.

प्रचलित मान्यता के अनुसार, हरिबल्लभ दास ने तांत्रिक विधि से यहां देवी की स्थापना की थी. मंदिर के गर्भगृह की कच्ची मिट्टी की संरचना को लेकर भी विशेष मान्यता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां तेलडीहा के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं. मंदिर के प्रधान पुजारी श्याम आचार्य के अनुसार, मां की महिमा अपरंपार है और भक्तों की अटूट आस्था के कारण यहां हर साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है.

मान्यता है कि नवरात्र की पहली पूजा पर जलपात्र चढ़ाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. कई श्रद्धालु सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर पैदल भी यहां पहुंचते हैं. सप्तमी से दशमी तक मंदिर में दर्शन और पूजा के लिए बड़ी संख्या में भक्तों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहता है. मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता के साथ दशहरा मेले का स्वरूप भी बदल रहा है. करीब पांच वर्ष पहले धार्मिक न्यास बोर्ड में शामिल होने और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की पहल के बाद यहां बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की उम्मीद बढ़ी है.

बिहार के Chief Minister सम्राट चौधरी का भी इस मंदिर से बचपन से जुड़ाव रहा है. उनका पैतृक आवास मंदिर से करीब चार किलोमीटर दूर बताया जाता है. सरकारी स्तर पर मंदिर क्षेत्र को धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के प्रयास की बात बताई जा रही है. प्रकाश, पेयजल, शौचालय, पार्किंग, स्वच्छता और श्रद्धालुओं की सुरक्षा जैसी सुविधाओं के विकास से यहां आने वाले लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, तेलडीहा की पहचान केवल मंदिर तक सीमित नहीं है.

इसके साथ बहने वाली बदुआ नदी यहां की धार्मिक परंपरा, ग्रामीण जीवन और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है. नदी किनारे सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही, पूजा की तैयारियां और घंटियों की गूंज एक विशिष्ट धार्मिक वातावरण बनाती हैं. ऐसे में मंदिर के विकास के साथ नदी के प्राकृतिक स्वरूप और स्वच्छता को सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती है. श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के बीच कचरा प्रबंधन, नदी में पूजा सामग्री जाने से रोकना, भीड़ नियंत्रण और तटों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. अतीत में भीड़ बढ़ने पर भगदड़ की स्थिति उत्पन्न होने के अनुभव के बाद प्रशासन के लिए पर्याप्त बैरिकेडिंग और सुचारु आवागमन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है.

धार्मिक पर्यटन स्थानीय दुकानदारों, प्रसाद विक्रेताओं, वाहन चालकों और ग्रामीण कारोबारियों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकता है. बदुआ नदी के तट पर सुरक्षा संबंधी निर्माण कार्यों में भी नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी का ध्यान रखना होगा. चार सदियों से अधिक पुरानी आस्था के केंद्र तेलडीहा के सामने अब विकास और विरासत के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है. मंदिर की भव्यता और श्रद्धालुओं की सुविधाएं बढ़ाने के साथ नदी, प्राकृतिक परिवेश और स्थानीय संस्कृति को बचाना भी उतना ही आवश्यक है. तेलडीहा का वास्तविक विकास तभी सार्थक होगा, जब यहां मंदिर की घंटियों के साथ बदुआ नदी की धारा भी सुरक्षित और स्वच्छ बनी रहे.

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एमएनपी/एसके