
ढाका, 6 सितंबर . बांग्लादेश में 11 दलों के गठबंधन के ढाका-चटगांव मार्च के बीच देश में Political बदलाव का विश्लेषण करते हुए एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव केवल एक ऐसी Political परिणति को वैध ठहराने की औपचारिकता बनकर रह गया है, जो पहले से ही सड़कों पर तय कर दी गई है.
बांग्लादेश के ‘डेली सन’ अखबार की रिपोर्ट में कहा गया, “11 दलों के गठबंधन के ढाका-चटगांव मार्च में कुछ स्पष्ट रूप से सुनियोजित था. काफिला बड़ा था, भीड़ उससे भी बड़ी और Political बयानबाजी सबसे बड़ी.”
रिपोर्ट में कहा गया है, “फेनी के महिपाल में जमात-ए-इस्लामी के अमीर और विपक्ष के नेता शफीकुर रहमान ने ‘फासीवाद के कदमों की आहट’ सुनने की चेतावनी दी. वहीं, एलडीपी के अध्यक्ष कर्नल (सेवानिवृत्त) ओली अहमद ने कहीं अधिक सटीक भविष्यवाणी की. उन्होंने दावा किया कि वर्तमान Government दिसंबर तक गिर जाएगी और गठबंधन से सत्ता संभालने की तैयारी में अनुशासन बनाए रखने का आग्रह किया.”
रिपोर्ट में अहमद की टिप्पणी को विपक्षी नेता द्वारा पूर्वानुमानित ‘उल्लेखनीय रूप से विशिष्ट समय-सीमा’ कहा गया.
रिपोर्ट में जोर दिया गया, “Governmentें आमतौर पर चुनावी हार, संसदीय बहुमत में बदलाव या संवैधानिक जनादेश की समाप्ति के माध्यम से बदलती हैं, वे शायद ही कभी Political रैली के मंचों से घोषित समाप्ति तिथियों के साथ आती हैं. फिर भी, गठबंधन से निकलने वाली भाषा तेजी से एक ऐसे गठबंधन को दर्शाती है जो मानक लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के बजाय एक असंवैधानिक टूट के लिए तैयारी कर रहा है.”
रिपोर्ट के अनुसार, जनमत संग्रह के फैसले का कार्यान्वयन, जुलाई में हुई हत्याओं के लिए जवाबदेही, गंभीर ऊर्जा कमी का समाधान, मूल्य स्थिरीकरण, कानून-व्यवस्था में सुधार और नागरिक प्रशासन को Political पक्षपात से अलग रखना गठबंधन की छह प्रमुख मांगें हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये जरूरी जन शिकायतें हैं जिन्हें कोई भी प्रशासन नजरअंदाज नहीं कर सकता, लेकिन यह भी याद दिलाया गया है कि वैध शिकायतें स्वाभाविक रूप से निवारण के असंवैधानिक तरीकों को वैध नहीं बनातीं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि शफीकुर की चेतावनियों की सावधानीपूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए, खासकर इस्तेमाल की गई बयानबाजी की गंभीरता को देखते हुए.
डेली सन की रिपोर्ट में जोर दिया गया, “चाहे दिसंबर विपक्ष द्वारा अनुमानित Political बदलाव लाए या केवल एक और अधूरी भविष्यवाणी बनकर रह जाए, व्यापक संस्थागत दांव किसी भी एक गठबंधन या चुनावी चक्र से कहीं अधिक हैं. मुख्य खतरा यह नहीं है कि कोई विपक्षी दल चुनाव जीतता है, बल्कि यह है कि चुनाव खुद एक रबर-स्टैंप कवायद बनकर रह जाता है जो सड़कों पर पहले से ही तय किए गए Political परिणाम को वैध ठहराता है.”
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डीएससी
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