बर्थडे स्पेशल: कभी गुजराती डायरेक्टर के ऑफिस के सामने काम के लिए चक्कर लगाते थे संगीतकार जयकिशन

Mumbai , 3 नवंबर . हिंदी सिनेमा में शंकर-जयकिशन की जोड़ी को महान संगीतकारों में से एक माना जाता है. शंकर सिंह राम सिंह रघुवंशी और जयकिशन दयाभाई पांचाल को ‘एस-जे’ के नाम से भी जाना जाता है.

जयकिशन दयाभाई पांचाल का जन्म 4 नवम्बर 1929 को दह्याभाई पांचाल के घर हुआ था. पिता धरमपुर के शासक के दरबारी संगीतकार थे. बचपन में वे Gujarat राज्य के एक कस्बे बांसदा (वंसदा) में रहते थे. जयकिशन हारमोनियम बजाने में निपुण थे. इसके बाद उन्होंने संगीत विशारद वादीलालजी और बाद में प्रेमशंकर नायक से संगीत की शिक्षा प्राप्त की. Mumbai आने के बाद वे विनायक तांबे के शिष्य बन गए.

पृथ्वी थिएटर में काम करने के अलावा शंकर अक्सर Gujaratी डायरेक्टर चंद्रवदन भट्ट के ऑफिस जाते थे. भट्ट ने शंकर से वादा किया था कि जब वह कोई फिल्म बनाएंगे तो उन्हें कंपोजर के तौर पर मौका मिलेगा. भट्ट के ऑफिस के बाहर ही शंकर ने जयकिशन को कई बार देखा. एक दिन उन्होंने बातचीत शुरू की और पता चला कि जयकिशन हारमोनियम प्लेयर हैं और काम की तलाश में हैं. उन्होंने जयकिशन को पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम प्लेयर की नौकरी का भरोसा दिलाया था. जल्द ही, दोनों में इतनी गहरी दोस्ती हो गई कि लोग उन्हें ‘राम-लक्ष्मण’ और कई मिलते-जुलते मतलब वाले निकनेम से बुलाने लगे. अपने म्यूजिकल कामों के अलावा वे मशहूर नाटक पठान समेत कई नाटकों में अहम रोल भी निभाते थे. पृथ्वी थिएटर में काम करते हुए शंकर और जयकिशन धुनें बनाते थे और राज कपूर के संपर्क में थे, जो प्रसिद्ध निर्देशक किदार शर्मा के सहायक के रूप में काम कर रहे थे और एक Actor और निर्देशक बनना चाहते थे. इस प्रकार, तीनों की मुलाकात पृथ्वी थिएटर में हुई थी.

12 सितंबर 1971 में जयकिशन की मृत्यु के बाद शंकर ने संगीत निर्देशक के रूप में काम करना जारी रखा और 1987 में अपनी मृत्यु तक 43 फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया. इस एकल काल के दौरान उन्हें “शंकर-जयकिशन” नाम से ही श्रेय दिया जाता रहा.

शंकर-जयकिशन ने अपने करियर की शुरुआत 1949 में राज कपूर की रोमांटिक ड्रामा बरसात से की. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सर्वकालिक ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसका साउंडट्रैक एल्बम भी बड़ी सफलता हासिल की, जिसने न केवल शंकर-जयकिशन को स्थापित किया. इसके बाद ‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ जैसी फिल्मों के संगीत ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया. उनकी धुनों में रोमांस, दर्द, मस्ती और बड़े ऑर्केस्ट्रा का खास अंदाज सुनाई देता था. ‘आवारा हूं’, ‘मेरा जूता है जापानी’ और ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ जैसे गाने आज भी पुराने हिंदी फिल्म संगीत के यादगार गीतों में शामिल हैं.

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ओपी/पीएम