
New Delhi, 26 सितंबर . 27 सितंबर 1833 को आधुनिक India के जनक राजा राममोहन राय ने इस दुनिया को अलविदा कहा था. उनकी पुण्यतिथि पर देश उस महान समाज सुधारक को याद कर रहा है, जिसने अकेले ही दोहरी लड़ाई लड़ी – एक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ और दूसरी अपने ही समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वास के खिलाफ.
राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम रमाकांत राय और माता का नाम तारिणी देवी था. असाधारण प्रतिभा के धनी राममोहन राय ने मात्र 15 वर्ष की आयु तक बंगाली, संस्कृत, अरबी और फारसी जैसी भाषाओं पर महारत हासिल कर ली थी. किशोरावस्था में उन्होंने देश भर का भ्रमण किया, जिससे उन्हें समाज की सच्चाई को करीब से समझने का मौका मिला.
1809 से 1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया, लेकिन जल्द ही उन्होंने नौकरी छोड़कर खुद को राष्ट्र सेवा में झोंक दिया. यहीं से उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ.
उस दौर में भारतीय समाज बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड और पर्दा प्रथा जैसी बुराइयों में जकड़ा हुआ था. राजा राममोहन राय ने इन कुरीतियों को झकझोरने का काम किया. उनका सबसे बड़ा योगदान सती प्रथा के उन्मूलन में माना जाता है. उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ लगातार आंदोलन चलाया, जिसके परिणामस्वरूप 1829 में तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को कानूनन अपराध घोषित कर दिया. इस साहसिक कदम के लिए उन्हें काफी विरोध का सामना भी करना पड़ा.
1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की, जो एकेश्वरवाद पर आधारित था और मूर्ति पूजा का विरोध करता था. वे भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक भी थे. 1825 में उन्होंने वेदांत विश्वविद्यालय की स्थापना की और अंग्रेजी शिक्षा, आधुनिक चिकित्सा और विज्ञान के अध्ययन को बढ़ावा दिया. उनके सबसे प्रमुख अनुयायी देवेंद्र नाथ टैगोर थे.
राजा राममोहन राय सिर्फ समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि निर्भीक पत्रकार भी थे. उन्होंने ‘ब्रह्ममैनिकल मैग्जीन’, ‘संवाद कौमुदी’, ‘मिरात-उल-अखबार’ और ‘बंगदूत’ जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया. ‘बंगदूत’ एक अनोखा पत्र था, जिसमें बांग्ला, हिंदी और फारसी तीन भाषाओं का प्रयोग एक साथ किया जाता था.
उनके जुझारू व्यक्तित्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1821 में जब एक अंग्रेज जज ने प्रताप नारायण दास नामक भारतीय को कोड़े लगाने की सजा दी और उसकी मौत हो गई, तो राय ने इस बर्बरता के खिलाफ बेबाक लेख लिखा. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और पत्रकारिता का कुशल संयोग कर दोनों को नई दिशा दी.
मुगल सम्राट ने उनके कार्यों से प्रभावित होकर उन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी थी, और वे इंग्लैंड और फ्रांस की यात्रा करने वाले पहले भारतीयों में से थे. ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में ही 27 सितंबर 1833 को उन्होंने अंतिम सांस ली.
आज भी जब हम आधुनिक, वैज्ञानिक और समानता पर आधारित India की बात करते हैं, तो उसकी नींव में राजा राममोहन राय के विचार ही दिखते हैं.
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एससीएच/
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