
New Delhi, 29 अक्टूबर . उत्तर प्रदेश, बिहार, Maharashtra और कर्नाटक में विधान परिषद (एमएलसी) की 28 सीटों पर हुए द्विवार्षिक चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली है. हालांकि, यह प्रदर्शन बेहद खराब माना जा रहा है, लेकिन Maharashtra की नागपुर ग्रेजुएट्स सीट पर मिली जीत ने पार्टी को पूरी तरह खाली हाथ रहने से बचा लिया.
इन चुनावों में कांग्रेस का जीत प्रतिशत महज 3.57 फीसदी रहा, जबकि उसके कई क्षेत्रीय सहयोगी दल उससे बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहे.
कांग्रेस की एकमात्र जीत Maharashtra के नागपुर ग्रेजुएट्स निर्वाचन क्षेत्र से आई, जहां अभिजीत वांजारी ने सीट बरकरार रखी. इस जीत से पहले पार्टी के पूरी तरह साफ हो जाने की आशंका जताई जा रही थी. भाजपा के कई नेताओं ने कांग्रेस के संभावित ‘शून्य प्रदर्शन’ को लेकर social media पर तंज कसा था.
अब कांग्रेस यह दावा कर सकती है कि उसके पास अभी भी कुछ क्षेत्रों में समर्थन आधार बना हुआ है और नागपुर उसका एक मजबूत गढ़ बना हुआ है.
कर्नाटक सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस को निराशा हाथ लगी. विशेष रूप से Bengaluru टीचर्स सीट पर हार पार्टी के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है.
यहां जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवार ए.पी. रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी पुट्टन्ना को करीब 900 वोटों से हरा दिया. राजधानी क्षेत्र की यह सीट कांग्रेस के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी.
बिहार के दरभंगा टीचर्स सीट पर भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस उम्मीदवार मदन मोहन झा, जो दो बार इस सीट से जीत चुके थे और मौजूदा एमएलसी थे, उन्हें प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने कड़े मुकाबले में हरा दिया.
रिपोर्टों के अनुसार, इंडिया गठबंधन के वोटों में बंटवारा भी हुआ क्योंकि लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था. इससे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को नुकसान पहुंचा.
Political विश्लेषकों का मानना है कि यदि नागपुर सीट भी कांग्रेस हार जाती तो यह उसके लिए और बड़ा Political झटका होता. हाल के वर्षों में Lok Sabha और विधानसभा चुनावों में लगातार कमजोर प्रदर्शन के बाद यह हार पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा सकती थी.
कांग्रेस अब इस एक जीत के आधार पर यह कह सकती है कि चुनाव नतीजे पूरी तरह एकतरफा नहीं रहे और कुछ क्षेत्रों में उसका प्रभाव अब भी मौजूद है.
पार्टी नेताओं का कहना है कि नागपुर जैसी Political रूप से महत्वपूर्ण सीट पर जीत मिलने से कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं का मनोबल बढ़ेगा. साथ ही कांग्रेस यह भी दावा कर सकती है कि शिक्षित और स्नातक मतदाताओं के एक वर्ग में उसका प्रभाव अब भी कायम है.
इन चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर विपक्षी खेमे में कांग्रेस की सीमित भूमिका को उजागर किया है. बिहार में राजद, उत्तर प्रदेश में Samajwadi Party और Maharashtra में एनसीपी (शरद पवार गुट) तथा शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) जैसे दल अधिक प्रभावी नजर आए.
कुल मिलाकर, कांग्रेस को नागपुर से मिली एकमात्र जीत ने उसे Political रूप से कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन व्यापक तस्वीर यही दिखाती है कि एमएलसी चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन कहीं अधिक मजबूत रहा.
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एएमटी/डीकेपी
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