दिब्येंदु बरुआ: भारत के दूसरे ग्रैंडमास्टर, जिन्होंने शतरंज में देश को दिलाई नई पहचान

New Delhi, 26 अक्टूबर . India में शतरंज को लोकप्रिय बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों में दिब्येंदु बरुआ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने उस दौर में शतरंज में अपनी पहचान बनाई, जब India में इस खेल के लिए सुविधाएं और संसाधन सीमित थे.

अपनी मेहनत, लगन और शानदार खेल के दम पर उन्होंने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं. साल 1991 में ग्रैंडमास्टर बनने के साथ ही वह विश्वनाथन आनंद के बाद India के दूसरे ग्रैंडमास्टर बने. उनकी इस उपलब्धि ने देश के कई युवाओं को शतरंज में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया.

दिब्येंदु बरुआ का जन्म 27 अक्टूबर 1966 को कोलकाता में हुआ था. उन्हें बचपन से ही शतरंज खेलने का शौक था. धीरे-धीरे यह शौक उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गया और उन्होंने इस खेल में आगे बढ़ने का फैसला किया. अमेरिकी शतरंज खिलाड़ी बॉबी फिशर से प्रेरित बरुआ ने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा दिखानी शुरू कर दी थी. वह खेल को समझने और अपनी चालों से विरोधियों को चुनौती देने में माहिर थे.

महज 12 साल की उम्र में दिब्येंदु बरुआ राष्ट्रीय शतरंज चैंपियनशिप में हिस्सा लेने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ियों में शामिल हो गए थे. इतनी छोटी उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका मिलना उनकी प्रतिभा को दर्शाता है. उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी और धीरे-धीरे बड़े खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई.

साल 1982 में बरुआ ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की, जिसने अंतरराष्ट्रीय शतरंज जगत का ध्यान उनकी ओर खींचा. उस समय केवल 16 साल के बरुआ ने पूर्व वर्ल्ड चैंपियन मिखाइल ताल को मात देकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. यह जीत उनके करियर के लिए काफी अहम साबित हुई. इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और भारतीय शतरंज को भी नई उम्मीद मिली.

दिब्येंदु बरुआ को साल 1983 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार खेल के क्षेत्र में उनके योगदान और उपलब्धियों के लिए दिया गया. इसके बाद उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी और साल 1991 में ग्रैंडमास्टर का प्रतिष्ठित खिताब हासिल किया. उस समय ग्रैंडमास्टर बनना किसी भी भारतीय शतरंज खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि थी. विश्वनाथन आनंद के बाद यह सम्मान हासिल करने वाले बरुआ दूसरे भारतीय बने.

उनकी खेल शैली आक्रामक और रचनात्मक थी. वह अपनी चालों से विरोधियों पर दबाव बनाने की कोशिश करते थे. मुश्किल परिस्थितियों में भी शांत रहकर फैसले लेना उनकी खासियत थी. उन्होंने कई शतरंज ओलंपियाड और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में India का प्रतिनिधित्व किया. इन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर उन्होंने दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों के बीच भारतीय शतरंज की पहचान मजबूत करने में योगदान दिया.

बरुआ ने केवल अपने खेल पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने का काम भी किया. साल 2005 में उन्होंने कोलकाता में ‘दिब्येंदु बरुआ शतरंज एकेडमी’ की स्थापना की. इसका उद्देश्य युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना और उनकी प्रतिभा को निखारना था. इस एकेडमी के माध्यम से कई खिलाड़ियों को शतरंज सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिला.

दिब्येंदु बरुआ का करियर भारतीय शतरंज के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है. उन्होंने सीमित सुविधाओं के दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की और युवाओं के लिए रास्ता बनाया. एक खिलाड़ी, प्रशिक्षक और शतरंज को बढ़ावा देने वाले व्यक्ति के रूप में उनका योगदान भारतीय खेल जगत के लिए प्रेरणादायक है. उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों को मेहनत और लगन के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की सीख देती हैं.

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आरएसजी