त्रियुगी नारायण मंदिर: जहां आज भी जल रही है शिव-पार्वती के विवाह की अग्नि

देहरादून, 26 अक्टूबर . उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिल में स्थित त्रियुगी नारायण मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन धाम है. मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था.

त्रियुगी नारायण नाम तीन शब्दों से मिलकर बना है, ‘त्रि’ का अर्थ है तीन, ‘युगी’ का अर्थ है युग और ‘नारायण’ का अर्थ है भगवान विष्णु. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां तीन युगों से पवित्र अग्नि प्रज्वलित है, जो इस मंदिर को शाश्वत प्रेम और भक्ति का प्रतीक बनाती है, जिसे लेकर लोगों का कहना है कि यह अग्नि तीन युगों (सत, त्रेता और द्वापर) से लगातार जल रही है, इसी कारण इस स्थान का नाम त्रियुगी नारायण पड़ा.

लोककिंवदंतियों के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और भगवान ब्रह्मा पुरोहित बने थे.

उत्तराखंड के Chief Minister पुष्कर सिंह धामी ने social media प्लेटफॉर्म एक्स के जरिए मंदिर की भव्यता पर प्रकाश डाला. उन्होंने लिखा, हर किसी को एक बार मंदिर के दर्शन के लिए जरूर आना चाहिए. त्रियुगी नारायण मंदिर की वास्तुकला प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर से मिलती-जुलती है और ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था. उत्तर भारतीय हिमालयी शैली में निर्मित इस मंदिर में भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्तियां स्थापित हैं. मंदिर परिसर में सबसे पवित्र स्थान ‘अखंड धुनी’ (सदाबहार अग्नि) है, जहां भक्त लकड़ी और प्रार्थनाएं अर्पित करते हैं. इस अग्नि की राख को अत्यंत शुभ माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि यह दंपतियों को सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देती है.

मंदिर के प्रांगण और आसपास चार प्रमुख कुंड हैं- रुद्र कुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्मा कुंड और सरस्वती कुंड. माना जाता है कि इन कुंडों में स्नान करने से आत्मा पवित्र होती है. वर्तमान समय में यह स्थान शुभ विवाह और ‘डेस्टिनेशन मैरिज’ के लिए भी बहुत लोकप्रिय हो चुका है. इस मंदिर में कई डेस्टिनेशन वेडिंग्स आयोजित की जा चुकी हैं और यह देश-विदेश के जोड़ों को आकर्षित करता रहता है. कई जोड़े यहां शादी करना पसंद करते हैं, इस विश्वास के साथ कि उन्हें भगवान शिव और देवी पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होगा.

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एनएस/पीएम