
New Delhi, 25 सितंबर . GST परिषद की 7 अक्टूबर को होने वाली अगली बैठक में बड़े स्तर पर GST दरों बदलाव की संभावना नहीं है. परिषद का फोकस दरों के बजाय ‘प्रक्रियागत सुधारों’ और हाल में किए गए दरों के युक्तिकरण के क्रियान्वयन पर रह सकता है. यह जानकारी वित्त मंत्रालय के सूत्रों की ओर से Friday को दी गई.
आने वाली बैठक में परिषद के पिछले एक साल के दौरान GST दरों में किए गए बदलावों के क्रियान्वयन की समीक्षा करने की उम्मीद है. इसमें दरों में व्यापक कटौती करने के बजाय क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं को दूर करने और दरों के युक्तिकरण के प्रभाव का आकलन करने पर ध्यान दिया जा सकता है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि 7 अक्टूबर की बैठक में ‘GST 2.0’ के तहत प्रक्रियागत सुधारों पर ध्यान दिया जाएगा. इनमें ई-इनवॉयसिंग और इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े नियम शामिल हैं. पिछली बैठक में दरों के युक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जबकि प्रक्रियागत सुधारों को अक्टूबर की बैठक तक टाल दिया गया था.
सीतारमण ने कहा था कि पिछली GST परिषद की बैठक में दरों के युक्तिकरण पर ध्यान दिया गया था, जबकि प्रक्रियागत सुधारों को अगली बैठक के लिए टाल दिया गया था.
सीतारमण ने उद्योग जगत से GST व्यवस्था में मौजूद किसी भी ऐसी विसंगति को लेकर विशिष्ट सुझाव देने को भी कहा, जिस पर Government ने अभी तक ध्यान नहीं दिया हो.
आगे की दिशा को लेकर वित्त मंत्री ने कहा कि कर नीति पर होने वाली चर्चा में अब महत्वपूर्ण आर्थिक उपस्थिति, वर्चुअल परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स पर कराधान, गिग इकोनॉमी, वैश्विक स्तर पर कर्मचारियों की आवाजाही, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और डिजिटल लेनदेन में वस्तुओं एवं सेवाओं के कर निर्धारण जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा.
सीतारमण ने यह भी कहा कि Government ऐसे संस्थागत तंत्र के लिए तैयार है, जिससे GST और आयकर कानूनों के तहत डिजिटल लेनदेन को वस्तु माना जाए या सेवा, इस पर अधिक स्पष्टता मिल सके. उन्होंने उद्योग जगत से इस मुद्दे पर प्रस्ताव और सुझाव भेजने को कहा.
उन्होंने कहा कि डिजिटल लेनदेन में वस्तुओं और सेवाओं के बीच अंतर करना उन मुद्दों में शामिल है जो कारोबार के सीमा-पार बढ़ते संचालन के साथ अधिक जटिल हो गए हैं.
वित्त मंत्री ने कर विशेषज्ञों, उद्योग संगठनों और शोधकर्ताओं से यह भी आग्रह किया कि वे केवल कम कर दरों, छूट और रियायतों की मांग तक सीमित न रहें, बल्कि उन प्रावधानों की पहचान करके साक्ष्य-आधारित कर नीति में अधिक सक्रिय योगदान दें, जो अब कर व्यवस्था के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं.
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एबीएस
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