
New Delhi, 3 नवंबर . Prime Minister Narendra Modi की ओर से Tuesday को social media प्लेटफॉर्म एक्स पर सुभाषित साझा किया गया है. उन्होंने मन और वाणी को संयमित कर सभी श्रेष्ठ उपलब्धियां प्राप्त करने का संदेश दिया है.
Prime Minister की ओर से संस्कृत श्लोक, “यस्य वाङ्मनसी स्यातां सम्यक् प्रणिहिते सदा. तपस्त्यागश्च सत्यं च स वै सर्वमवाप्नुयात्॥ साझा किया गया है, जिसका हिंदी भावार्थ है कि जिस मनुष्य की वाणी और मन दोनों सदा भली-भांति संयमित और एकाग्र रहते हैं, जिसका जीवन तप, त्याग और सत्य से संपन्न है, वह निश्चय ही जीवन की सभी श्रेष्ठ उपलब्धियां प्राप्त करता है.
पीएम मोदी की ओर से साझा किया गया यह श्लोक प्रसिद्ध ग्रंथ महाIndia के शांतिपर्व से लिया गया है. गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘गीतार्थ संग्रह’ जैसे संकलनों में भी इस श्लोक का जिक्र किया गया है. इस श्लोक के माध्यम से कहा गया है कि जिस मनुष्य की वाणी और मन सदा भली-भांति एकाग्र व वश में रहते हैं और जो त्याग, तपस्या तथा सत्य से युक्त होता है, वह संसार में सब कुछ (हर प्रकार की सफलता और सिद्धि) प्राप्त कर सकता है.
इसके माध्यम से सीख दी गई है कि मनुष्य जो बोलता है, उसमें संयम होना चाहिए. कटु वचन न बोलना और हमेशा हितकर व मधुर बोलना ही वाणी का नियंत्रण है. भटकते हुए मन को रोककर उसे सही और सकारात्मक दिशा में लगाना. मन और वाणी का एक होना (जो मन में हो, वही वाणी में हो) मानसिक शुद्धि का लक्षण है. अपने लक्ष्य के लिए लगातार बिना थके प्रयास करना, कष्टों को सहना और अनुशासित जीवन जीना. स्वार्थ, अहंकार और बुरी आदतों को छोड़ने की क्षमता रखना. दूसरों की भलाई के लिए अपनी सुख-सुविधाओं का बलिदान देना और आचरण और विचारों में ईमानदारी रखना.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि वास्तविक शक्ति और सफलता किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन से मिलती है. जिसने अपने मन, वाणी और आचरण को सत्य और तप के मार्ग पर ढाल लिया, उसके लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता.
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एसडी/एएस
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