जलेबी खाते-खाते सुना ऐसा प्रवचन, 13 साल के पवन ने छोड़ दिया घर, ऐसे बने संत तरुण सागर

New Delhi, 31 अगस्त . कभी किसी ने सोचा नहीं होगा कि कोई दुकान पर जलेबी खाते-खाते सुने प्रवचन से प्रभावित होकर संत बन सकता है. ऐसी ही कुछ कहानी प्रसिद्ध जैन मुनि तरुण सागर महाराज की है. विश्वभर में प्रवचन के लिए विख्यात राष्ट्रीय संत तरुण सागर को कभी जलेबी बहुत पसंद थी.

Madhya Pradesh के दमोह जिले के तेंदूखेड़ा ब्लॉक के छोटे से गांव गुहंची में 26 जून 1967 को प्रताप चंद जैन के घर बेटे का जन्म हुआ. घर में उन्हें प्यार से ‘मुन्ना’ कहा गया, जबकि स्कूल में उनका नाम पवन रखा गया. चार भाइयों और तीन बहनों वाले परिवार में पवन चौथे बेटे थे.

बचपन में पवन रोजाना गांव से स्कूल जाते समय रास्ते में एक दुकान पर जलेबी खाते थे. करीब 13 वर्ष की उम्र में इसी दुकान पर एक दिन उनके जीवन की दिशा बदल गई. जलेबी खाते समय उनके कानों में आचार्यश्री पुष्पदंत सागर महाराज के प्रवचन पड़े. प्रवचन में उन्होंने सुना कि मनुष्य अपने कर्मों के जरिए भगवान बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. यह बात बालक पवन के मन में गहराई से उतर गई.

पवन घर लौटे और माता-पिता के सामने संत बनने की इच्छा जाहिर कर दी. परिजनों ने उन्हें समझाने और रोकने की काफी कोशिश की. माता-पिता उन्हें लेकर आचार्यश्री पुष्पदंत सागर महाराज के पास पहुंचे और उनसे पवन को समझाने का आग्रह किया. आचार्यश्री ने कहा कि पवन को दस दिन उनके पास रहने दिया जाए. संभव है कि यह केवल बचपना हो और कुछ दिनों बाद उनका निर्णय बदल जाए लेकिन दस दिन बाद भी पवन अपने संकल्प पर अडिग रहे.

आखिरकार उन्होंने आचार्यश्री पुष्पदंत सागर महाराज से दीक्षा ली और ‘तरुण सागर’ नाम पाया. 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने एलक के रूप में दीक्षा ग्रहण की. इसके बाद 20 वर्ष की उम्र में उन्हें दिगंबर मुनि की उपाधि मिली. छोटी उम्र में लिया गया यह संकल्प आगे चलकर देशभर में उनकी पहचान बना गया.

तरुण सागर महाराज ने अपने प्रवचनों के जरिए अहिंसा, आत्मसंयम, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया. उनकी वाणी की बेबाकी के कारण उन्हें ‘कड़वे प्रवचन’ के लिए विशेष पहचान मिली. उन्होंने लाल किले से देश को संबोधित किया. भारतीय सेना के जवानों को भी संबोधित किया. Bengaluru के राजभवन और Madhya Pradesh विधानसभा जैसे महत्वपूर्ण मंचों पर भी उनके विचार सुने गए.

ब्रह्मचर्य जीवन में तरुण सागर महाराज केवल तीन बार अपने गांव गुहंची पहुंचे और हर बार गांव की धर्मशाला में ठहरे. जिस गांव की गलियों से उनका बचपन शुरू हुआ था, वहीं से उनका आध्यात्मिक सफर आगे बढ़कर देश-विदेश तक पहुंच गया.

51 वर्ष की उम्र में 1 सितंबर 2018 को तरुण सागर महाराज ने दिल्ली के कृष्णा नगर स्थित राधेपुरी में अपने चातुर्मास स्थल पर सुबह 3 बजकर 18 मिनट पर देह त्याग दी. वह लंबे समय से तेज बुखार और पीलिया से जूझ रहे थे. देह त्यागने से एक दिन पहले उन्होंने औषधि का त्याग कर दिया था.