चुनावों में मिली हार और पार्टी के भीतर बगावत के बीच एआईएडीएमके जिला सचिवों की बैठक 1 नवंबर को

चेन्नई, 29 अक्टूबर . अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (एआईएडीएमके) के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने 1 नवंबर को जिला सचिवों की एक बैठक बुलाई है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब पार्टी पर कई मोर्चों से दबाव बढ़ रहा है. इसमें 2026 के विधानसभा चुनावों में हार, हालिया उपचुनावों में मिली असफलताएं और वरिष्ठ नेताओं से जुड़ा अनसुलझा विद्रोह शामिल हैं.

हालांकि अभी तक किसी एजेंडे की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन यह बैठक काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि दिसंबर तक पार्टी की जनरल काउंसिल और कार्यकारी समिति की बैठक बुलाना जरूरी है. इस बैठक में होने वाली चर्चा से यह संकेत मिल सकता है कि नेतृत्व किस तरह संगठनात्मक समीक्षा की मांगों और लगातार चुनावी हार के कारणों का आकलन करने की योजना बना रहा है.

इस महीने की शुरुआत में मदुरांतकम और धारापुरम विधानसभा उपचुनावों में एआईएडीएमके के तीसरे स्थान पर रहने के बाद जिला सचिवों की पहली बैठक होगी. ये हार इसलिए भी ज्यादा नुकसानदेह रहीं, क्योंकि अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी ने इन दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी.

इन हारों ने विधानसभा चुनावों की निराशा को और बढ़ा दिया, जिसमें एआईएडीएमके केवल 47 सीटें ही जीत पाई और सत्ता में वापसी करने में असफल रही. इसके बाद इन दो सीटों को भी न बचा पाने के कारण पार्टी के भीतर असंतोष और गहरा गया है. साथ ही पार्टी की चुनावी रणनीति और नेतृत्व को लेकर नए सवाल भी उठने लगे हैं.

पूर्व मंत्री सी वी शनमुगम और एस. पी. वेलुमणि सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की निर्णय लेने वाली इकाइयों की बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि लगातार मिल रही हार पर चर्चा की जा सके.

हालिया नतीजों के बाद उनकी यह मांग और भी महत्वपूर्ण हो गई है और असंतुष्ट नेताओं ने आपस में बातचीत तेज कर दी है. पार्टी के भीतर यह संकट विधानसभा चुनावों के बाद तब शुरू हुआ, जब एआईएडीएमके के 25 विधायकों ने नेतृत्व के खिलाफ जाकर मई में हुए विश्वास मत के दौरान टीवीके Government का समर्थन किया था.

इसके बाद पलानीस्वामी ने असंतोष जताने वाले कई नेताओं को उनके संगठनात्मक पदों से हटा दिया और उनकी जगह अन्य लोगों को महत्वपूर्ण जिला पदों पर नियुक्त कर दिया, हालांकि बाद में कुछ वरिष्ठ नेताओं को अन्य जिम्मेदारियां दी गईं, लेकिन उन्हें उनके पुराने जिला सचिव के पदों पर वापस नहीं लाया गया.

उदाहरण के लिए वेलुमणि को उप-महासचिव नियुक्त किया गया, लेकिन उन्हें कोयंबटूर उपनगरीय दक्षिण जिला इकाई का नियंत्रण वापस नहीं मिला. इन बदलावों के बाद भी जिला-स्तरीय प्रभाव को लेकर चल रहा विवाद अनसुलझा ही रहा. उपचुनाव प्रचार के दौरान गुटीय मतभेद भी खुलकर सामने आए, क्योंकि पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची में षणमुगम, वेलुमणि और पूर्व मंत्री पी. थंगामणि का नाम शामिल नहीं था.

एक महत्वपूर्ण चुनावी परीक्षा से ठीक पहले इनका सूची से बाहर रहना नेतृत्व और असंतुष्ट गुट के बीच जारी मतभेदों को दर्शाता है. ऐसे हालात में सबकी नजरें इस बात पर टिकी होंगी कि क्या Sunday की बैठक में मिली हार की गहन समीक्षा हो पाती है और क्या आम परिषद (जनरल काउंसिल) की तैयारियों के लिए कोई रास्ता खुलता है. संगठनात्मक जिम्मेदारियों या सुलह को लेकर लिया गया कोई भी फैसला, चुनावी और आंतरिक चुनौतियों के प्रति पार्टी की तत्काल प्रतिक्रिया को दिशा दे सकता है.

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ओपी/