चीन का जातीय एकता कानून अल्पसंख्यकों पर ‘चीनी पहचान’ अपनाने का बढ़ा रहा दबाव: रिपोर्ट

बीजिंग, 3 जुलाई . चीन में एक जुलाई से लागू नया ‘जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून जातीय अल्पसंख्यकों को चीनी पहचान अपनाने के लिए मजबूर कर रहा है. इसके साथ ही माता-पिता को कहा गया है कि वे अपने बच्चों को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) से प्यार करना सिखाएं.

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कानून में ऐसे किसी भी काम पर रोक लगाई गई है जो ‘जातीय एकता को कमजोर करे या अलग-अलग समुदायों के बीच विभाजन पैदा करे.’ चीन में Government 56 आधिकारिक जातीय समुदायों को मान्यता देती है. इनमें सबसे बड़ा समुदाय ‘हान चीनी’ है, जो देश की 1.4 अरब आबादी का 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा है.

कानून में कहा गया है कि स्कूलों का पाठ्यक्रम ऐसा हो, जिससे छात्रों में यह भावना मजबूत हो कि वे सभी एक ही चीनी राष्ट्र का हिस्सा हैं.

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई वर्षों से चीन के President शी जिनपिंग तिब्बती, उइगर और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसी पहचान अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जिसमें चीनी राष्ट्र और सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादारी सबसे अहम हो.

अप्रैल में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक पत्र जारी कर कहा था कि यह कानून तिब्बती, उइगर और मंगोल जैसे समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर असर डाल सकता है.

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरे देशों में रहने वाले लोगों के खिलाफ भी किया जा सकता है. नए कानून के तहत चीन उन लोगों को भी निशाना बना सकता है जो उसकी सीमाओं के बाहर रहते हैं, अगर उसे लगता है कि उन्होंने उसके नियमों का उल्लंघन किया है.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर पहले भी दूसरे देशों में रहने वाले लोगों पर दबाव बनाने के आरोप लग चुके हैं. मानवाधिकार संगठन ‘सेफगार्ड डिफेंडर्स’ की 2022 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दुनिया भर में चीन के 100 से ज्यादा कथित ‘व‍िदेशी Police स्टेशन’ चल रहे हैं. इनका इस्तेमाल विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों पर नजर रखने, उन्हें परेशान करने और कुछ मामलों में उन्हें वापस चीन भेजने के लिए किया जाता है.

आलोचकों का कहना है कि इस कानून का असर दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और जातीय अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं पर पड़ सकता है.

मेलबर्न की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में चीन की जातीय नीतियों पर शोध करने वाले प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने कहा कि अब बीजिंग ‘जातीय एकता’ को सिर्फ एक Political नारा या स्थानीय प्रचार का हिस्सा नहीं मान रहा है.

उन्होंने सीएनएन से कहा, “Government अब एक ही चीनी राष्ट्रीय पहचान बनाने को स्कूलों, परिवारों, मीडिया, संग्रहालयों, सरकारी अधिकारियों, बजट, तकनीकी प्लेटफॉर्म और सुरक्षा एजेंसियों सभी की जिम्मेदारी बना रही है.”

उन्होंने कहा कि इसका साफ संदेश है कि अल्पसंख्यक समुदाय अपनी पहचान तभी रख सकते हैं, जब वह कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से तय की गई चीनी पहचान के अधीन हो.

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