
New Delhi, 27 सितंबर . चुनाव आयोग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर सियासत तेज हो गई है. कांग्रेस सांसद करमवीर बौद्ध ने राहुल गांधी का समर्थन करते हुए कहा कि मतदाताओं की चिंताओं का चुनाव आयोग को स्पष्ट जवाब देना चाहिए.
उन्होंने कहा कि देश संविधान से चलता है और संविधान के तहत अलग-अलग संवैधानिक संस्थाएं बनाई गई हैं. इन संस्थाओं में काम करने वाले सभी अधिकारी और कर्मचारी किसी पार्टी या किसी Government के नहीं होते बल्कि वे नियम-कायदों से चलते हैं. अगर किसी संवैधानिक संस्था पर कोई टिप्पणी होती है तो उसका जवाब संबंधित विभाग या उसके प्रमुख को ही देना चाहिए.
कांग्रेस सांसद ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनावों इतनी बड़ी धांधली हुई है, Governmentों को लूटा गया है और चुनाव आयोग ने एक बार भी इसका जवाब नहीं दिया. जब पूरा देश सवाल उठा रहा है तब जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त बयान देते हैं कि तीनों आयुक्त एक साथ हैं. सवाल है कि आप दस महीने तक सो रहे थे क्या?
उन्होंने कहा कि क्या आवाज उठाना और सवाल पूछना गलत है? आज एसआईआर के माध्यम से लाखों वोट काटे जा रहे हैं और गलत वोट बनाए जा रहे हैं. पश्चिम बंगाल समेत कई जगहों पर कितने मामले लंबित हैं. चुनाव आयोग ने जितने वोट काटे थे, जांच के बाद उनमें से कितने सही पाए गए, इसका जिम्मेदार कौन है और कौन पूछेगा?
करमवीर बौद्ध ने कहा कि जब एक आम नागरिक भी सवाल पूछ सकता है, तो राहुल गांधी तो देश के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और Lok Sabha में विपक्ष के नेता हैं. वे देश में लोकतंत्र को बचाने का काम कर रहे हैं.
वहीं, Patna में बिहार Government के मंत्री अशोक चौधरी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्ष की मांग पर पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों की संयुक्त बैठक और प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद यह विवाद खत्म हो जाना चाहिए.
अशोक चौधरी ने कहा, “तीनों आयुक्त एक साथ बैठे, उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपनी बात रखी. जब हम कैबिनेट में बैठते हैं तो हमारी राय में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जो फैसले लिए जाते हैं वे सर्वसम्मत होते हैं. चुनाव आयोग ने साबित कर दिया है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. फिर हंगामा किस बात का है?”
उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कैसा मुद्दा है. अपनी छवि बनाने के लिए जनता के बीच कुछ भी किया जा सकता है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है. इसकी कोई वैधता नहीं है और विपक्ष देश को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है.
गौरतलब है कि Saturday को चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी कर स्पष्ट किया था कि एसआईआर से जुड़े सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति से लिए गए हैं.
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पीआईएम/पीएम
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