
सोनापुर, 14 सितंबर . कभी तालाब, पोखर और नदियों पर निर्भर रहा मछली पालन अब तकनीक, नवाचार और उद्यमिता के सहारे एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. असम के सोनापुर स्थित India के पहले एक्वा टेक पार्क में इसी बदलाव की तस्वीर दिखाई देती है, जहां कम पानी और सीमित संसाधनों में अधिक उत्पादन की संभावनाओं को आधुनिक तकनीकों के जरिए जमीन पर उतारने का प्रयास किया जा रहा है. यहां मछली पालन महज आजीविका का साधन नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, स्वरोजगार और उद्यमिता से जुड़ा एक संभावित व्यवसायिक मॉडल बनता दिखाई दे रहा है.
उत्तर प्रदेश से असम पहुंचे पत्रकारों ने सोनापुर के बागीबाड़ी स्थित एक्वा टेक पार्क का भ्रमण किया और आधुनिक मत्स्य पालन की तकनीकों, प्रशिक्षण व्यवस्था, नवाचार तथा रोजगार की संभावनाओं की जानकारी ली. पार्क में बायोफ्लॉक, एक्वापोनिक्स, आधुनिक मत्स्य उत्पादन और सजावटी मछली पालन जैसी तकनीकों के प्रदर्शन के साथ किसानों और युवाओं को इनके व्यावहारिक इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है. एक्वा टेक पार्क की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां मत्स्य पालन को पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ाने के बजाय पानी और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है. बायोफ्लॉक तकनीक इसका एक उदाहरण है.
इसमें सीमित मात्रा में पानी का प्रबंधन और पुन: उपयोग करते हुए अधिक मछली उत्पादन की संभावना विकसित की जाती है. ऐसे क्षेत्रों में जहां बड़े तालाब या पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां यह तकनीक छोटे स्तर पर मत्स्य पालन शुरू करने वाले किसानों और युवाओं के लिए उपयोगी हो सकती है. पार्क में इस तकनीक को केवल प्रदर्शित ही नहीं किया जा रहा, बल्कि किसानों को इसकी कार्यप्रणाली समझाकर इसे वास्तविक परिस्थितियों में अपनाने के लिए तैयार किया जा रहा है.
इसी तरह एक्वापोनिक्स में मछली पालन को पौधों की खेती से जोड़ा गया है. एक ही प्रणाली में मछली और पौधों का उत्पादन करने वाली यह व्यवस्था पानी और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करती है. एक्वा टेक पार्क को विकसित करने वाली संस्था कालोंग-कोपिली के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ज्योतिष तालुकदार के अनुसार, संस्था वर्ष 2007 से असम और पूर्वोत्तर में आधुनिक एवं जलवायु-अनुकूल मत्स्य पालन, प्राकृतिक खेती, सामुदायिक विकास और जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रही है.
उन्होंने बताया कि संस्था के प्रयासों से अब तक 60 हजार से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जबकि एक लाख से अधिक युवाओं और महिलाओं को सशक्तीकरण और आजीविका के अवसरों से जोड़ा गया है. असम से शुरू हुआ यह काम अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, त्रिपुरा, और मेघालय के अलावा बिहार और Odisha तक पहुंच चुका है. तालुकदार के मुताबिक, एक्वा टेक पार्क को सिर्फ प्रदर्शन केंद्र तक सीमित रखने के बजाय प्रशिक्षण, तकनीक, अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता का एकीकृत केंद्र बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है.
इसके पीछे सोच यह है कि किसान और युवा केवल तकनीक को देखें नहीं, बल्कि उसे सीखें, अपनाएं और आगे चलकर उससे अपना व्यवसाय खड़ा कर सकें. पार्क में तकनीक के चयन को लेकर भी एक महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया जा रहा है. फिशरी विशेषज्ञ अश्लेषा श्रबोर्नि ने बताया कि किसानों को उनके क्षेत्र की परिस्थितियों, उपलब्ध पानी, संसाधनों और स्थानीय जरूरतों के आधार पर तकनीक चुनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. यानी लक्ष्य किसी एक तकनीक को हर जगह लागू करना नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करना है. यही पहल आधुनिक मत्स्य पालन को छोटे और सीमांत किसानों के लिए अधिक व्यावहारिक बनाने की कोशिश करती है.
इस मॉडल की नींव एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल से पड़ी थी. कालोंग-कोपिली का एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल 10 जुलाई 2021 को आईसीएआर-सीआईएफए और India Government की मान्यता प्राप्त पहल के रूप में सामने आया. समय के साथ इसे विस्तार देकर एक्वा टेक पार्क का स्वरूप दिया गया. पार्क का उद्घाटन 12 जुलाई 2025 को असम के Chief Minister हिमंत बिस्वा सरमा ने किया था. इसके विकास में नाबार्ड, आईसीएआर-सीआईएफए, असम Government के मत्स्य विभाग और अन्य सहयोगी संस्थाओं की भूमिका रही है. कालोंग-कोपिली के अनुसार, संस्था के 18 वर्ष से अधिक के अनुभव से तैयार इस मॉडल में अब तक 60 हजार से अधिक किसानों को प्रशिक्षण, एक लाख से अधिक युवाओं और महिलाओं का सशक्तीकरण, 3,050 से अधिक महिला स्वयं सहायता समूहों को जोड़ना और 420 से अधिक सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (सीआरपी) को विकसित करना शामिल है.
इसके अलावा 350 से अधिक एक्वा उद्यमियों को तैयार करने और चार किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के गठन की जानकारी दी गई. पार्क में मत्स्य पालन को सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है. इससे आने वाले समय में उत्पादन लागत, ऊर्जा की उपलब्धता और टिकाऊ मत्स्य पालन के बीच बेहतर संतुलन बनाने की संभावना देखी जा रही है. असम और पूरे पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों की आजीविका कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है. ऐसे में एक्वा टेक पार्क का प्रयोग इस मायने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि यहां मछली पालन को केवल पारंपरिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि तकनीक आधारित ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित करने की कोशिश हो रही है.
एक छोटे से तालाब से शुरू होने वाला यह मॉडल यदि किसानों तक व्यापक स्तर पर पहुंचता है तो कम पानी, सीमित जमीन और स्थानीय संसाधनों वाले युवाओं के लिए भी मत्स्य पालन स्वरोजगार का विकल्प बन सकता है. यही वजह है कि सोनापुर का यह पार्क केवल मछली उत्पादन की तकनीक दिखाने वाला केंद्र नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की संभावनाओं वाला प्रयोग बनकर उभर रहा है.
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विकेटी/डीएससी
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