
New Delhi, 9 सितंबर . India में पेड़-पौधों का महत्व सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि प्राचीन समय से ही कई पौधों का इस्तेमाल औषधीय जरूरतों के लिए भी किया जाता रहा है. ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पौधा है बेल, जिसे संस्कृत में बिल्व और अंग्रेजी में वुड एप्पल कहा जाता है. नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड, आयुष मंत्राल ने social media प्लेटफॉर्म एक्स पर बेल के औषधीय महत्व से जुड़ी जानकारी साझा की है.
वनस्पति विज्ञान में बेल का नाम एगल मार्मेलोस है और यह रैसेसी परिवार से संबंधित है. यह पेड़ मुख्य रूप से India और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी माना जाता है. India में यह सूखे जंगलों और मैदानी क्षेत्रों में आमतौर पर देखने को मिलता है. खास बात यह है कि बेल अलग-अलग तरह की जलवायु में भी आसानी से पनप सकता है और कम उपजाऊ मिट्टी में भी अच्छी तरह बढ़ने की क्षमता रखता है.
बेल का पेड़ मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष होता है, जिसकी ऊंचाई करीब 15 मीटर तक पहुंच सकती है. इसकी पत्तियां तीन पत्तियों वाले समूह यानी त्रिपर्णी होती हैं और इनमें हल्की सुगंध होती है. बेल के फूल हरे-सफेद रंग के और सुगंधित होते हैं. इसका फल कच्चा और सूखने के बाद भी कई पारंपरिक उपयोगों में काम आता है.
आयुर्वेद में बेल को लंबे समय से महत्वपूर्ण औषधीय पौधे के रूप में देखा जाता है. इसके फल, पत्तियां और जड़ विभिन्न पारंपरिक औषधीय उपयोगों में इस्तेमाल किए जाते हैं. विशेष रूप से बेल के फल को पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है. राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के अनुसार इसमें एंटी-डायरियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल जैसे औषधीय गुण बताए गए हैं. इसके अलावा इसमें एंटीबायोटिक और ब्रोंकोडायलेटर गतिविधियों का भी जिक्र किया गया है.
बेल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी काफी गहरा है. भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है. यही वजह है कि बेल का पेड़ भारतीय परंपरा में औषधीय उपयोग के साथ-साथ आध्यात्मिक दृष्टि से भी विशेष स्थान रखता है.
–
पीआईएम/पीएम
Skip to content