
New Delhi, 26 अक्टूबर . India ने अभी आजादी की सुबह देखी ही थी कि 22 अक्टूबर 1947 को उस पड़ोसी देश ने भितरघात किया, जो India से महज कुछ घंटों पहले अलग हुआ था. Pakistanी फौज ने जम्मू-कश्मीर में कत्लेआम मचाना शुरू कर दिया. जब India इस लड़ाई का हिस्सा बना तो एक ऐसा वीर योद्धा खड़ा हुआ, जिसने न सिर्फ जीत सुनिश्चित की बल्कि इस जीत का सेहरा अपने सिर बांधा.
यह कहानी है भारतीय सेना के कमांडिंग ऑफिसर रहे दीवान रंजीत राय की, जो India की पहली सिख रेडिमेंट का हिस्सा थे. दीवान रंजीत राय ने इस लड़ाई में दुश्मन के सामने अदम्य साहस दिखाया था.
India से टूटकर Pakistan एक अलग मुल्क बन चुका था लेकिन उस दौरान जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी. वहां के शासक महाराजा हरि सिंह ने India या Pakistan किसी भी देश में तुरंत शामिल होने के बजाय जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र रियासत बनाए रखने का फैसला किया था लेकिन Pakistan उसे अपने में मिलाने का इरादा कर चुका था.
स्थानीय कबाइलियों के भेष में आई Pakistanी फौज जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कर चुकी थी और बेगुनाह लोगों को मारना शुरू कर दिया था. तकरीबन 11 हजार लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. इस बात का सबूत यह है कि Pakistan के ब्रिगेडियर अकबर खान ने अपनी किताब ‘रेडर्स इन कश्मीर’ में इस बात का जिक्र किया है.
24 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह ने India Government को टेलीग्राम लिखकर मदद की गुहार लगाई थी. 26 अक्टूबर 1947 को राजा हरि सिंह ने India के साथ समझौता किया, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर India का अभिन्न हिस्सा बन गया.
बिना वक्त गंवाए भारतीय सेना ने मोर्चा संभाल लिया. Pakistanियों को ढेर करने के मजबूत इरादों के साथ दिल्ली स्थित पालम एयरपोर्ट से डीसी-3 एयरक्राफ्ट पहली सिख रेडिमेंट की दो कंपनियों को लेकर रवाना हुआ. कश्मीरियों ने भारतीय फौजियों को अपना मुहाफिज और रक्षक माना. इस भरोसे को पहली सिख रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय ने सच करके दिखाया.
लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय ने एक अहम फैसला लिया और श्रीनगर में रुकने के बजाय सीधा बारामूला चले गए. यह ऐसा फैसला था, जिसने कश्मीरी आवाम को न सिर्फ दहशतगर्दी से बचाया बल्कि उनके दिलों में जगह भी बनाई.
इस भीषण लड़ाई में भारतीय सेना ने Pakistanी सेना की धूर्तता को धूल चटाई और कमांडिंग ऑफिसर दीवान रंजीत राय ने इस जीत का सेहरा अपने सिर बांधा. हालांकि, अग्रिम मोर्चे पर डटकर मुकाबला करते हुए वे 27 अक्टूबर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए. दीवान रंजीत राय को उनके शौर्य और अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया.
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डीसीएच/पीएम
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