उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रद्द करने की एबीवीपी ने की मांग

Bengaluru, 13 सितंबर . अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की Bengaluru इकाई ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) में उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘प्रिजनर नंबर 626710 इज प्रेजेंट’ की प्रस्तावित स्क्रीनिंग रद्द करने की मांग की है.

फिल्मकार ललित वाचानी की यह डॉक्यूमेंट्री 14 सितंबर को विश्वविद्यालय की छात्र संस्था लॉ एंड सोसाइटी कमेटी (लॉ सोक) द्वारा दिखाई जानी प्रस्तावित है. यह कार्यक्रम उमर खालिद के समर्थन में आयोजित किया जा रहा है और यूएपीए के तहत बिना मुकदमा शुरू हुए उनकी गिरफ्तारी के छह वर्ष पूरे होने के मौके पर रखा गया है.

यह स्क्रीनिंग देशभर में विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जा रहे एकजुटता कार्यक्रमों और स्क्रीनिंग श्रृंखला का हिस्सा है. यह कार्यक्रम Political बंदी दिवस (13 सितंबर) के एक दिन बाद और उमर खालिद की 2020 में हुई गिरफ्तारी की तारीख के साथ भी मेल खाता है.

जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज है और वह सितंबर 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं. मामले में अभी तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है.

एबीवीपी Bengaluru के सचिव अभिनंदन मिर्जी ने प्रेस बयान जारी कर प्रस्तावित स्क्रीनिंग की कड़ी निंदा की. उन्होंने कहा कि एबीवीपी ने इस कार्यक्रम को रोकने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को ईमेल के जरिए औपचारिक शिकायत भी भेजी है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

बयान में कहा गया कि शैक्षणिक परिसरों को राष्ट्रीय अखंडता और शिक्षा के लिए समर्पित रहना चाहिए, न कि Political प्रचार या नागरिक अशांति का महिमामंडन करने का मंच बनना चाहिए.

एबीवीपी के नेता गिरीश ने भी एनएलएसआईयू के कुलपति प्रोफेसर सुधीर कृष्णास्वामी को पत्र लिखकर डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रद्द करने की मांग की है.

इससे पहले अगस्त में जेएनयू प्रशासन ने उमर खालिद की पुस्तक ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ पर प्रस्तावित चर्चा के लिए दिए गए स्थल की अनुमति वापस ले ली थी.

वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने से कहा कि उनके बेटे को किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है और ऐसी स्क्रीनिंग रोकने की कोशिश “तानाशाही रवैया” है.

उन्होंने कहा, “जब तक किसी व्यक्ति को अदालत दोषी करार नहीं देती, तब तक कानून की नजर में वह निर्दोष माना जाता है. अपराध साबित होने से पहले कार्यक्रमों या स्क्रीनिंग को रोकना गलत और अलोकतांत्रिक तरीका है.”

इलियास ने यह भी कहा कि उमर खालिद मामले को लेकर India और विदेशों के कई मीडिया संगठनों, मानवाधिकार समूहों और अन्य मंचों पर सवाल उठाए गए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि एनआरसी और सीएए विरोधी आंदोलनों से जुड़े लोगों को दिल्ली दंगों से जोड़कर उनके खिलाफ झूठे मामले बनाए गए.

उन्होंने कहा कि छह साल बीत जाने के बावजूद मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है. ऐसे में उमर खालिद और अन्य आरोपियों को जमानत मिलनी चाहिए थी, लेकिन निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट और Supreme Court तक हर स्तर पर जमानत में देरी हो रही है.

डीएससी