
विशाखापट्टनम, 4 नवंबर . दीपावली का पर्व मां लक्ष्मी के धरती पर आगमन का प्रतीक है. इस दिन हर घर, दुकान को दीयों से रोशन किया जाता है, ताकि धन की देवी मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर वहां वास करें और अगर बात मां लक्ष्मी के चमत्कारी धाम की हो, तो विशाखापट्टनम के श्री कनक महालक्ष्मी मंदिर का नाम सबसे पहले आता है.
विशाखापट्टनम (विजाग) का ‘श्री कनक महालक्ष्मी मंदिर’ अपनी अनूठी परंपराओं और स्थापत्य के कारण उत्तर आंध्र प्रदेश का एक बेहद प्रसिद्ध और पूजनीय धार्मिक स्थल है. दीपावली और धनतेरस के पावन अवसर पर इस मंदिर की खासियत और रौनक कई गुना बढ़ जाती है. यहां विराजमान मां महालक्ष्मी की मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि इसे किसी ने बनाया नहीं, बल्कि यह जमीन से खुद प्रकट हुई है, तो आइए जानते हैं ‘मां कनक महालक्ष्मी’ के इस पवित्र मंदिर से जुड़ी खास बातें और दीपावली पर यहां होने वाले पूजा-पाठ के बारे में.
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके गर्भगृह के ऊपर कोई छत या गुंबद (गोपुरम) नहीं है. माता कनक महालक्ष्मी खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं. दीपावली की रात जब पूरा मंदिर दीपों और आधुनिक रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है, तो खुले आसमान के नीचे दीयों की रोशनी में माता की स्वयंभू मूर्ति का अलौकिक और दिव्य रूप देखते ही बनता है.
दीपावली और धनतेरस के पावन अवसर पर माता कनक महालक्ष्मी को विशेष रूप से सोने और चांदी के प्राचीन व बहुमूल्य आभूषणों से सजाया जाता है. कनक का अर्थ ‘सोना’ होता है, इसलिए दीपावली पर सुख, समृद्धि और आर्थिक स्थिरता की कामना के लिए देश भर से हजारों व्यापारी और श्रद्धालु यहां विशेष दर्शन के लिए उमड़ते हैं. आम पारंपरिक हिंदू मंदिरों के विपरीत, यहां भक्तों और भगवान के बीच कोई पर्दा या दूरी देखने को नहीं मिलती है.
दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर भी श्रद्धालु स्वयं सीधे गर्भगृह में जाकर माता की मूर्ति को स्पर्श कर सकते हैं और अपने हाथों से अभिषेक या कुमकुम अर्चना कर सकते हैं. इस पावन दिन पर अपने हाथों से धन और समृद्धि की देवी की पूजा करने का एक विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है. दीपावली की रात महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष मंत्र-जाप, महाआरती और पंचामृत अभिषेक जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं.
यह मंदिर वैसे तो प्रतिदिन सुबह 5 बजे से रात 12 बजे (मध्यरात्रि) तक खुला रहता है, लेकिन दीपावली के खास मौके पर उमड़ने वाली भारी भीड़ और विशेष अनुष्ठानों को देखते हुए श्रद्धालुओं के लिए दर्शन के विशेष इंतजाम किए जाते हैं. हालांकि, दीपावली के अलावा यहां मार्गशीर्ष मास (नवंबर-दिसंबर) के दौरान महीने भर चलने वाला ‘मार्गशीर्ष मास महोत्सव’ विशेष रूप से मनाया जाता है, जिसमें Thursday के दिन भारी भीड़ होती है.
लोकमान्यताओं के अनुसार, यहां पर मां लक्ष्मी स्वयंभू रूप में विराजमान हैं. बताया जाता है कि साल 1912 में देवी लक्ष्मी की यह प्रतिमा एक कुएं से मिली थी, जिसे बाद में उसी स्थान पर स्थापित किया गया था. इन्हें विशाखापत्तनम शहर की अधिष्ठात्री (संरक्षक) देवी माना जाता है. यह भी मान्यता है कि माता सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी करती हैं.
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एनएस/एएस
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