
काबुल/इस्लामाबाद, 30 सितंबर . काबुल में अपनी मनमर्जी चलाने में नाकाम रहने के बाद Pakistan ने अब अफगानिस्तान में सीधे तौर पर सैन्य ताकत दिखानी शुरू कर दी है. इस्लामाबाद न तो वहां की Government पर अपना प्रभाव जमा पा रहा है और न ही उसके पास कोई दूसरा ठोस विकल्प बचा है, जिसकी वजह से वह लगातार हवाई हमलों का सहारा ले रहा है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बदलाव इस बात को रेखांकित करता है कि रणनीतिक गहराई का सिद्धांत किस हद तक ध्वस्त हो गया है, और Pakistan अब उसी तालिबान की जीत को अस्थिर करने के तरीके खोज रहा है, जिसका उसने कभी जश्न मनाया था.
‘पारहेशिया न्यूज’ में एक रिपोर्ट में बताया गया, “यूएनएएमए ने एक बार फिर अफगानिस्तान में Pakistanी हवाई हमलों के बाद नागरिकों की मौत की पुष्टि की है. कुनार में सितंबर के हमलों में एक पुरुष, एक महिला और एक बच्ची मारे गए. इस्लामाबाद ने घोषणा की थी कि उसने आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया है और टीटीपी लड़ाकों को मारा है. उन लड़ाकों की पहचान स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं की गई है, जबकि नागरिकों की पहचान, हमेशा की तरह, अब नाम, परिवार और मरने की जगह के साथ हुई है. यह Pakistan के अफगान युद्ध में बार-बार होने वाला असंतुलन बनता जा रहा है: सेना अपने लक्ष्यों की घोषणा करती है, जबकि दूसरे उसके द्वारा मारे गए लोगों का दस्तावेजीकरण करते हैं.”
इसके अनुसार, सितंबर के हमले कोई अलग-थलग घटना नहीं थे. Pakistanी अभियानों में बार-बार अफगान नागरिकों की मौत हुई है, चाहे वह सीमावर्ती प्रांत हों या काबुल में ओमेद नशा पुनर्वास केंद्र.
Pakistan भले ही यह दावा करे कि उसके हमले आतंकियों पर थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है. रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस्लामाबाद हमलों के बाद अपने टारगेट को लेकर अलग ही कहानी पेश करता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह तो हो सकता है कि किसी हमले में आम नागरिक और आतंकी दोनों मारे जाएं, लेकिन जब बार-बार आम अफगानों की मौत की पुष्टि हो रही है, तो सिर्फ इरादे को सबूत नहीं माना जा सकता. बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमले में मारा कौन गया?
सेना अपने ऑपरेशन को सही ठहराती है, लेकिन उसके दावों के पक्ष में सबूत ढूंढना मुश्किल है, जबकि आम नागरिकों के मारे जाने के सबूत साफ तौर पर मौजूद हैं, जिनके नाम और परिवार तक सामने हैं.
Pakistanी सेना हमेशा से यह कहकर राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखती है कि देश की सुरक्षा सिर्फ वही सुनिश्चित कर सकती है. लेकिन खैबर पख्तूनख्वा में लगातार जारी हिंसा और उग्रवाद ने सेना के इसी दावे की पोल खोल दी है.
रिपोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ एक सैन्य विफलता नहीं है, बल्कि इससे कहीं बड़ा मामला है.
लगातार हो रहे हमले यह साबित करते हैं कि सुरक्षा के नाम पर सत्ता पर काबिज रहने का सेना का तर्क अब कमजोर पड़ रहा है और उसकी Political हैसियत पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं.
रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि कैसे Pakistan के जनरल अफगानिस्तान में युद्ध लड़ रहे हैं क्योंकि वे काबुल पर अपनी मर्जी थोपने में विफल रहे हैं. वे घर पर भी एक Political लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि वे यह स्वीकार नहीं कर सकते कि उन्होंने टीटीपी पर कितना कम नियंत्रण हासिल किया है. हवाई हमले उन्हें एक साथ दोनों लड़ाइयां लड़ने की अनुमति देते हैं. वे एक ऐसी अफगान Government को दंडित कर सकते हैं जो उनकी बात मानने से इनकार करती है और उस सजा को Pakistanियों के सामने सबूत के रूप में पेश कर सकते हैं. वे अपनी विफलता के सबूतों को गायब करते हैं.”
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एबीएम
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