सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस: जानें, क्या हैं विवाद की प्रमुख वजहें

सुप्रीम कोर्ट के चारों जजों ने जिन मुद्दों को लेकर अपनी चिंता जताई, उनमें से एक केसों के आवंटन को लेकर रोस्टर का विवाद है। तय सिद्धांत यह है कि चीफ जस्टिस कामकाज आवंटित करने में सर्वेसर्वा हैं और उन्हें रोस्टर तय करने का विशेषाधिकार है। लेकिन इस विशेषाधिकार के तहत चीफ जस्टिस की अपने अन्य साथी जजों पर न तो लीगल और न ही सुपरवाइजरी अथॉरिटी है। न्याय शास्त्र का सिद्धांत है कि चीफ जस्टिस प्रथम होते हुए भी अन्य जजों के समान हैं। न तो इससे ज्यादा और न ही इससे कम हैं। चीफ जस्टिस रोस्टर तय करते हुए बेंच का स्ट्रेंथ भी तय करते हैं। जजों ने कहा कि पिछले काफी समय से इन नियमों का सख्ती से पालन नहीं किया जा रहा है। इससे संस्था की गरिमा संदेह के घेरे में आती है। ऐसे कई उदाहरण वाले मामले हैं जिनका देश पर दूरगामी प्रभाव होता। उन मामलों को चीफ जस्टिस ने अपनी पसंद की कोर्ट में भेजा, जिसका कोई तार्किक आधार नहीं था। जज लोया और मेडिकल कॉलेज स्कैम के मामलों में ऐसा किया गया।

 रोस्टर का विवाद
रोस्टर तय करने के मामले में कहा गया कि देश और संस्था (सुप्रीम कोर्ट) के लिए दूरगामी नतीजे वाले मामलों को चीफ जस्टिस ने बिना किसी तार्किक आधार पर ‘अपनी पसंद’ की बेंचों को आवंटित किया। इस संबंध में 27 अक्टूबर 2017 को आर.पी. लूथरा बनाम केंद्र का केस एक उदाहरण है, जिसमें किसी और बेंच ने आदेश दिया। जजों ने कहा कि जब एमओपी पर इस अदालत की संविधान बेंच को फैसला सुनाना था तो यह समझना मुश्किल है कि कैसे कोई अन्य बेंच इस पर सुनवाई कर सकती है। बेंच के फैसले के बाद कलीजिअम के 5 न्यायाधीशों ने चर्चा की और एमओपी को फाइनल करके तत्कालीन सीजेआई ने मार्च 2017 में भारत सरकार को भेजा। भारत सरकार ने पत्र का जवाब नहीं दिया है। ऐसे में यह माना जाए कि सरकार उसे स्वीकार चुकी है। ऐसे में कोई और बेंच उस पर टिप्पणी न करे।

क्या है जज लोया का मामला
सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के स्पेशल जज बीएच लोया की रहस्यमय हालात में एक दिसंबर, 2014 को दिल का दौरा पड़ने से नागपुर में मौत हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत को शुक्रवार को एक ‘गंभीर मुद्दा’ बताया था और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर रही याचिकाओं पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा। सुनवाई के दौरान ‘बॉम्बे लॉयर्स असोसिएशन’ का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा था कि हाई कोर्ट इस पर सुनवाई कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट को याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए। दवे ने कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट इसमें सुनवाई करता है तो हाई कोर्ट के समक्ष उलझन खड़ी हो सकती है। इस बीच, बेंच ने जज लोया मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी को तय कर दी है।

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