सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में बचे कचरे से बनेंगी ईंटे

अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में बचने वाली गंदगी से ईंटें बनाई जा सकेंगी. ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक बनाई है, जिससे इन प्लांटों में बचने वाले बायोसॉलिड को या तो खाद के तौर पर या ईंट बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा. अभी तक इस तरह के 30 प्रतिशत से अधिक कचरे को लैंडफिल साइटों पर डाला जाता है, जिससे जमीन का बड़ा हिस्सा किसी काम का नहीं रहता. इस कचरे से निकलने वाली गैसें भी वातावरण को नुकसान पहुंचाती हैं.

मेलबॉर्न के आरएमआईटी विश्वविद्यालय ने इस तरह के कचरे से बनी ईंटों को प्रदर्शित किया है. उसका कहना है कि इससे बायोसॉलिड की समस्या का तो निदान होगा ही, ईंट उद्योग को भी मदद मिलेगी. इस महीने के जर्नल बिल्डिंग में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक इससे ईंट बनाने के लिए परंपरागत तरीकों की तुलना में आधे ईंधन की ही जरूरत पड़ती है. बायोसॉलिड से बनी ईंटें ऊष्मा की कुचालक होने की वजह से गर्मियों में घर भी भीतर से ठंडा रहेगा.

ऑस्ट्रेलिया में हर साल 50 लाख टन बायोसॉलिड पैदा होता है. अगर यहां पर ईंट उत्पादक कुल बनने वाली ईंटों में सिर्फ 15 प्रतिशत बायोसॉलिड का भी प्रयोग करें तो यह सभी उसमें खप जाएगा. दुनिया के अन्य देशों मंे भी इस तकनीक से लाभ मिलेगा. इस तरह से बनने वाली ईंटों के भौतिक, रासायनिक व यांत्रिक गुणों में भी भारी अंतर पाया गया है. जब ईंटों के उत्पादन में अलग-अलग प्रतिशत में बायोसॉलिड मिलाया गया तो उनके गुणों में भी अंतर पाया गया. विशेषज्ञाें ने यह रिसर्च 10 से 25 प्रतिशत बायोसॉलिड मिलाकर की. इस तरह से बनी ईंटे कॉम्प्रेसिव स्ट्रेन्थ टेस्ट में भी पास हाे गईं. जिन ईंटों में 25 फीसदी बायोसॉलिड मिलाया गया था उन्हें बनाने में ईंधन भी आधा लगा. इस प्रोजेक्ट से जुुड़े मोहैरानी कहते हैं कि यह न केवल बायोसॉलिड की समस्या से छुटकारा दिला सकता है बल्कि इससे कार्बन का उत्सर्जन घटाने में भी मदद मिलेगी. इतना ही नहीं यह आर्थिक तौर पर भी फायदेमंद होगा. @ newatlas.com

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