भारतीय इतिहास में अब भारत ही नजर नहीं आता – डॉ पांडेय

उदयपुर, 11 जुलाई (उदयपुर किरण). हमारे जीवन और राष्ट्र को दिशा देने वाली विभूतियों की जीवनियां भारतीय इतिहास से बाहर हो गई हैं. जहां हम अपमानित हो सकते हैं, ऐसे विषयों को इतिहास से जोड़ा जा रहा है. जो उचित नहीं है. परिणाम यह आ रहा है कि भारतीय इतिहास में भारत ही नजर नहीं आता है. यह बात दूसरी है कि राजस्थान ही ऐसा एकमात्र प्रदेश है जिसके सभी जिलों का इतिहास प्रकाशित हो चुका है. अब बात यह है कि महाराणा प्रताप व कुंभा के अलावा देश में अन्य कई महापुरुष हुए हैं, जिनका इतिहास बहुत ही संक्षिप्त रूप में पढ़ाया जाता है. समय है जब इन सभी महापुरुषों के इतिहास को संकल्पित किया जाए और उससे जुडा एक पाठ्यक्रम बनाकर स्कूली शिक्षा से ही लागू किया जाए.
यह बात अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना New Delhi के संगठन सचिव डॉ. बीएम पांडेय ने कही. अवसर था, बुधवार को जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के संघटक इतिहास एवं संस्कृत विभाग व भारतीय इतिहास अनुसंधाान परिषद् New Delhi के साझे में आयोजित तीन दिवसीय महाराणा कुंभा- व्यक्तित्व एवं कृतित्व विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के उदघाटन का.
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो एसएस सारंगदेवोत ने कहा कि प्रदेश में जितने दुर्ग हैं, जो महाराणा कुंभा द्वारा बनवाए गए हैं, वे सिर्फ दुर्ग ही नहीं बल्कि उनकी सूझबूझ का अनुपम उदाहरण हैं. चित्तौड दुर्ग के सारे दरवाजे कुुंभा की ही देन हैं तो कुंभलगढ का दुर्ग अपने आप में अद्वितीय है. कुंभा द्वारा स्थापत्य तथा प्रतिमा विज्ञान के क्षेत्र में किए गए अभिनव प्रयोगों व मूर्ति शिल्प की वर्तमान में भी महत्ती आवश्यकता है. उनके काल में शास्त्र की मान्यताओं का सामंजस्य एवं नवीन स्थापनाओं की भी महत्ती उपयोगिता रही थी.
संगोष्ठी में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष प्रो. अरविंद जामखेडकर ने कहा कि भारतीय इतिहास में महाराणा प्रताप और महाराणा कुंभा ऐसे दो व्यक्तित्व रहे हैं, जिन्होंने सोशल व इकोनोमिक कंडीशन को समानांतर रूप में लाने का प्रयास किया. जो वर्तमान इतिहास के बैकबोन के रूप में है.
मुख्य वक्ता व इतिहासविद प्रो. के.एस. गुप्ता ने कहा कि मेवाड़ ऐसा क्षेत्र है, जहां एक लाख साल पहले भी मानव का विचरण माना गया है. आहड सभ्यता से टर्की तक व्यापार के संकेत मिलते हैं, यहां से जस्ता टर्की भेजा जाता था. 1433 में वापस वैदिक सभ्यता स्थापित करने का कार्य महाराणा कुंभा ने ही किया है.
संगोष्ठी में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् New Delhi के सदस्य सचिव प्रो. कुमार रत्नम ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में भी राजस्थान को उचित स्थान देने का निर्णय किया है. इसके तहत यूजीसी जो पाठयक्रम तैयार कर रहा है, उसके एक भाग में मध्यकालीन इतिहास में जहां औरंगजेब को पढेंग़े वहीं दूसरे भाग में महाराणा प्रताप व कुंभा भी शामिल होंगे. इससे छात्रों में स्वाभिमान की भावना भी जगेगी. उन्होंने कहा कि जहां तक बात महाराणा कुंभा की है तो यहां कुछ ने उन्हें राष्ट्रीय शासक बताया है, जबकि कुछ ने उन्हें क्षेत्रीय शासक. दरअसल वे सर्वगुण संपन्न थे. इसी को दृष्टिगत विवि अनुदान आयोग ने अब पाठयक्रम में बदलाव की पहल की है.
संगोष्ठी के समन्वयक डॉ हेमेंद्र चौधरी व डॉ सौरभ कुमार मिश्रा ने बताया कि कुंभाकालीन सामाजिक स्थिति, कुंभाकालीन प्रासाद व मूर्तिशिल्प, उनकी सैन्य नीति का आधार स्तंभ, कुंभलगढ, मंदिर, धार्मिक जीवन, ज्योतिष व वास्तु शास्त्र, एकलिंग माहात्म्य में प्रतिबिंबित मेवाड की पारिस्थितिकी, उनकी रक्षा नीति, स्थापत्य कला आदि विषयों पर तकनीकी सत्र हुए. इन सत्रों में करीब 40 शोध पत्रों का वाचन हुआ.
संगोष्ठी के दौरान भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद द्वारा राणा कुंभा के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाशित स्मारिका का विमोचन भी अतिथियों ने किया.

 

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