भवसागर से पार उतारती है भगवती की आराधनाः रामकृष्ण

हरिद्वार, 11 जुलाई (उदयपुर किरण). भगवती की आराधना भक्त को भवसागर से पार उतारती है. प्रत्येक युग में श्रीहरि को भी अपने अवतार पूर्ण करने के लिए मां भगवती की शरण में जाना पड़ा.

उक्त उद्गार श्री 108 बाल ब्रह्मचारी मिशन के परमाध्यक्ष ऋषि रामकृष्ण महाराज ने गुरु पूर्णिमा महोत्सव के उपलक्ष्य में निर्धन निकेतन में श्रोताओं को श्रीमद् देवीभागवत कथा सुनाते हुए कही.

त्रेता एवं द्वापर के अवतारों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम राजा राम को भी भगवान के रुप में स्थापित करने का श्रेय माता भगवती को ही जाता है. देवर्षि नारद के कहने पर जब उन्होंने मां भगवती की नवरात्र साधना की तभी उनको लंका पर विजय प्राप्त हुई.

कथा व्यास सत्यराज शास्त्री ने मां भगवती के 52 शक्तिपीठों का वर्णन करते हुए कहा कि जब माता सती अपने पिता के यज्ञ में दग्ध हो गयीं तब भोलेनाथ उनकी पार्थिव देह को लेकर हिमालय की ओर गए. जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्ति पीठों की स्थापना हुई. इनके दर्शन का आज भी बड़ा महत्व है. उन्होंने कहा कि जिस स्थान से धर्म और संस्कृति का संवर्द्धन होता है वह स्थान स्वयं ही सिद्धपीठ बन जाता है.

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