ईरानी फतवे के डर से छिपकर जी रहे रश्दी चाहते स्वतंत्र जीवन

पेरिस, 11 फरवरी (उदयपुर किरण). अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी की ओर से जारी मौत के फतवे के डर की वजह से छिपकर रह रहे प्रसिद्ध ब्रितानी भारतीय लेखक सलमान रुश्दी ऊब गए हैं. वह निर्भीक होकर जीना चाहते हैं. उन्होंने पेरिस की यात्रा के दौरान समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, ‘‘मैं छिपकर नहीं रहना चाहता हूं.’

’ उल्लेखनीय है कि रुश्दी का जीवन 14 फरवरी, 1989 को उस समय हमेशा के लिए बदल गया था, जब मौजूदा ईरान के संस्थापक खुमैनी ने रुश्दी की किताब ‘‘द सैटेनिक वर्सेज’ को ईशनिंदा करार देते हुए उनकी मौत का फतवा जारी किया था. रुश्दी 13 साल तक नकली नाम और लगातार पुलिस सुरक्षा में रहे. उन्होंने सितंबर में कहा था, ‘‘मैं उस समय 41 वर्ष का था और अब मैं 71 वर्ष का हूं. अब चीजें सही हो गई हैं.’’ उन्होंने अफसोस जताया, ‘‘हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां चीजें तेजी से बदलती हैं. यह मामला पुराना हो चुका है.अब भयभीत करने वाली कई अन्य चीजें है.

’’ तेहरान ने कहा था कि उनके ऊपर से खतरा हट गया है. इसके तीन साल बाद 11 सितंबर, 2001 को रुश्दी ने नकली नाम इस्तेमाल करना बंद कर दिया था. लेकिन पेरिस में एएफपी के साथ साक्षात्कार के दौरान उनके फ्रांसीसी प्रकाशक के कार्यालय के बाहर सादे कपड़ों में सशस्त्र पुलिसकर्मी तैनात रहे. रुश्दी ने कहा कि उनकी पुस्तक को गलत समझा गया. ‘द सेटेनिक वर्सेज’ उनकी पांचवीं पुस्तक थी और अब उन्होंने अपनी 18वीं पुस्तक ‘द गोल्डन हाउस’ लिखी है. उनकी ‘द गोल्डन हाउस’ पुस्तक मुंबई के एक व्यक्ति की कहानी है जो लेखक की ही तरह अपने अतीत से पीछा छुड़ाने के लिए न्यूयॉर्क में स्वयं को ढ़ूंढ़ता है.

‘द ब्लैक एलबम’ के ब्रितानी पाकिस्तानी लेखक हनीफ कुरैशी ने भी कहा कि जब उन्होंने ‘द सेटेनिक वर्सेज’ की प्रति पढ़ी थी, तो उन्हें इसमें कुछ भी विवादित नहीं लगा था.

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