सिलीकोसिस के चलते 50 की उम्र पार नहीं कर पाते मनौर गुड़ियाना के मजदूर

पन्ना, 04 दिसम्बर (उदयपुर किरण). पन्ना जिले में जहां-जहां पत्थर खदानें और क्रेसर चल रहे हैं, उन स्थानों पर हजारों मजदूर काम कर रहे हैं, लेकिन उनको खदान संचालकों द्वारा न तो कोई सुविधा उपलब्ध कराई जाती है और न ही सुरक्षा किट दिये जाते हैं. इसके चलते मनौर पंचायत के गुड़ियाना मजरा के लगभग 90 प्रतिशत लोग 50 की उम्र पार होने के पूर्व ही स्वर्ग सिधार जाते हैं.

गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति सूरज दयाल गौंड हैं, जिनकी आयु 53 वर्ष है. उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से चर्चा के दौरान अपनी व्यथा और ग्रामीणों की मूलभूत समस्याओं के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि यहां अधिकांश पुरुष सिलीकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं, जिसके कारण मेहनत-मजदूरी करने में अक्षम हैं. गांव के करीब 40 फीसदी पुरुष इस खतरनाक बीमारी की चपेट में हैं. पुरुषों के असमय काल कवलित होने से गांव में कई महिलाएं 30 से 35 वर्ष की उम्र में विधवा हो गई हैं और ऐसी स्थिति में बच्चों व परिवार के भरण पोषण का भार उन्हीं ऊपर है.

बता दें कि पन्ना जिला मुख्यालय से महज 7 किलोमीटर दूर स्थित आपदाओं से ग्रस्त ग्राम मनौर गुडिय़ाना की आबादी 700 के करीब है. इस छोटे से गांव में गरीबी का गहरा दर्द छिपा है. यहां जाकर ऐसा प्रतीत होता है कि गरीबी, भुखमरी और बीमारी इस गांव के आदिवासियों की नियति बन चुकी है. परम्परागत रूप से मनौर गुड़ियाना गांव के पुरुष पत्थर की खदानों मे काम करते रहे हैं, उनकी आजीविका का यह साधन ही उनके लिये अभिशाप साबित हुआ है. पत्थर की खदानों में 5-10 साल तक लगातार काम करने वाले पुरुष जानलेवा बीमारी सिलीकोसिस के शिकार हो गये हैं.

इसके चलते उनकी कार्यक्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई है. वे धीरे-धीरे मौत की ओर अग्रसर हो रहे हैं. सिलीकोसिस पीडि़त इस गांव के आदिवासियों का सही व समय पर इलाज नहीं होने के कारण 50 वर्ष की उम्र तक पहुंचने से पहले ही ज्यादातर की मौत हो जाती है. यही वजह है कि मनौर गुड़ियाना गांव में विधवा महिलाओं की संख्या तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है. ग्रामीणों के मुताबिक मौजूदा समय इस छोटे से गांव में 30 से अधिक विधवा महिलाएं हैं, जो अपने व परिवार के भरण पोषण हेतु संघर्ष कर रही हैं.

जंगल एवं खदानें बनी आजीविका का सहारा: खेती किसानी न होने तथा रोजी रोजगार के अभाव में गांव के आदिवासियों का एकमात्र सहारा जंगल है. आदिवासी महिलाएं जंगल से जलाऊ लकड़ी आती हैं, जिसे 7 किलोमीटर दूर पन्ना ले जाकर बेचती हैं. लकड़ी बेचने से जो भी पैसा मिलता है. उसी से पूरे परिवार का भरण पोषण होता है. गांव के कुछ युवक जो पत्थर खदानों में काम नहीं करते, वे काम की तलाश में महानगरों की तरफ पलायन कर जाते हैं. ऐसी स्थिति में शारीरिक रूप से कमजोर और मेहनत मजदूरी करने में असमर्थ पुरुष ही गांव में रहते हैं, जबकि महिलायें पूरे दिन मेहनत करती हैं. महिलाओं का ज्यादा वक्त जंगल में गुजरता है. वे पत्थर खदान के प्रदूषण से दूर रहती हैं, यही वजह है कि पुरुषों के मुकाबले वे अधिक वर्षों तक जीवित रहती हैं.

गांव की आदिवासी महिला दुजिया बाई व हल्की बाई ने बताया कि वे बच्चों को स्किल इसलिये नहीं भेज पाते, क्योंकि सुबह लकड़ी लेने जंगल निकल जाते हैं. लकड़ी लेकर तक जंगल से वापस घर लौटते हैं, तब तक स्कूल का समय निकल चुका होता है. हल्की बाई ने बताया कि 30 वर्ष की उम्र मे ही उसके पति रामप्रसाद की मौत सिलीकोसिस के कारण हो गई, मेरे चार बच्चे हैं, जिन्हें पालने की जवाबदारी मेरे ऊपर है. इस विधवा महिला ने बताया कि जंगल ही हमारी आजीविका के सहारा है.

सिलीकोसिस के उपचार की नहीं कोई व्यवस्था: जानलेवा सिलीकोसिस की बीमारी का प्रकोप अकेले मनौर गुडिय़ाना में नहीं अपितु पन्ना जिले के उन सभी इलाकों में है, जहां पत्थर की खदानें चलती हैं, लेकिन आज तक करोड़ों रुपये कमाने वाले ठेकेदारों द्वारा मजदूरों को पत्थर खदानों में आवश्यक सुविधाएं एवं सुरक्षा किट उपलब्ध नहीं कराये. इस ओर प्रशासन स्तर से भी कोई विशेष पहल नहीं की गई. पत्थर खदानों में पत्थर की डस्ट 5-6 सालों मे खदान के कारीगर व मजदूर को लाचार बना देती है. जिले में सिलीकोसिस पीडि़त मरीजों की संख्या अधिक होने के बावजूद यहां पर उनके इलाज की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है.

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