रचना के लिए संवेदनात्मक बेचैनी जरुरी : मायामृग

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राज्य स्तरीय युवा साहित्यकार सम्मेलन सम्पन्न

उदयपुर। रचना के लिए संवेदनात्मक बेचैनी बहुत जरुरी है। किसी भी सार्थक एवं गंभीर रचना के लिए लेखक की बेचैनी, असंतोष का भाव तथा परिवर्तन की छटपटाहट आवश्यक होती है। आसपास के परिवेश में व्याप्त विसंगतियां और विडम्बनाएं तथा मानवीय मूल्यों में आते जा रहे क्षरण को लेकर रचनाकार के मन में  चिंताएं पैदा होती हैं। इन चिंताओं का समग्र प्रकटीकरण ही साहित्य रचना के रूप में अभिव्यंजित होता है। ये विचार विख्यात कवि मायामृग ने राजस्थान साहित्य अकादमी में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय युवा साहित्यकार सम्मेलन के अंतिम दिन समापन सत्र में व्यक्त किए। वे समारोह को मुख्य अतिथि के तौर पर संबोधित कर रहे थे।

कार्यक्रम के संयोजक गौरीकांत शर्मा ने बताया कि सत्र की अध्यक्षता  शिक्षाविद् श्री सुरेन्द्र सिंह राव ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक सजग रचनाकार को तथा खासतौर पर युवा रचनाकार को अपनी रचना के जरिये समाज के प्रत्येक क्षेत्र में समरसता तथा सामंजस्य एवं समन्वय भाव को केन्द्र में रखकर रचनाकर्म में प्रवृत्त होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि रचनाकार के लिए इतिहास बोध, संस्कृति बोध तथा समकालीन युगबोध के बीच संतुलन स्थापित करना श्रेयस्कर है।

इससे पूर्व विचार सत्र में कथेतर गद्य की विभिन्न विधाओं यथा संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, डायरी, ललित निबंध और आलोचना पर केन्द्रित व्याख्यान हुए। डाॅ. नवीन नंदवाना,डाॅ. सुरेन्द्र डी. सोनी और प्रो. मलय पानेरी ने उक्त विधाओं की रचनात्मक बारीकियांे, शिल्प विधान तथा भाषा के सृजनात्मक विनिवेश को लेकर अनेक जटिल मुद्दों तथा इन विधाओं की रचनात्मक चुनौतियों पर केन्द्रित सारगर्भित विचार प्रकट किए। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक डाॅ. ज्योतिपुंज ने युवा रचनाकारों से अपने समाज तथा परिवेश पर सजग, चैकस एवं सतर्क निगाह रखते हुए साहित्यिक तत्व की पहचान करते हुए रचनाधर्मिता का निर्वाह करने की अपील की।  उक्त सत्र में प्रेम एस. गुर्जर और अश्विनी त्रिपाठी ने अपने पत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के अंत में डाॅ. राजकुमार व्यास ने सम्मेलन का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और डाॅ. ममता जोशी धन्यवाद ज्ञापित किया।

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